एकांत योगी

एकांत योगी

By | 2016-07-17T20:39:12+00:00 June 13th, 2016|Categories: कविता|0 Comments

सुनो…..!
यूँ ही नहीं
सुर निकलता कोई
बिना दर्द के पिघलता कोई
दर्द का तार छिड़ता है तो
शिद्द्त से गिटार बजता है
तपस्या होती है
साधना होती है
यूं ही नहीं
कृष्ण के वियोग में
मीरा वियोगनी होती है
इकतारा बजता है
मन के तार के साथ
दिल के तार का मिलाप हो जाता है
रमता जोगी प्रेम का प्याला
पीकर झूमजाता है
रोम रोम पुलकित होकर
सुरमई हो जाता है
बसंत आकर चला जाता है
और पतझड़………
दूर तलक
ख़ामोश पत्तों की सरसराहट के
संगीत के साथ सन्नाटा छोड़ जाता है
दिल को झकझोर देता है
ऐसे में .. हाँ! ऐसे में
एकांत योगी
सन्नाटे की ख़ामोशी के सुरों को अपनी
उँगलियों के पोरों के साथ तारों को झंकारते हुए
अपने एकालाप राग के साथ मिलाते हुए
मन की जलतरंगों में हिलोर ला देता है
दिल के जज़्बात आँखों के झरनों से हो निकलते हैं
बुझे बुझे से तन बदन मोम के जैसे पिघलने लगते हैं
अरमान मचलने लगते हैं करवटें लेते हैं
शिव की तरह तांडव करने लगते हैं
क़ायनात डगमगाने लगती हैं
तब सम्भालना मुश्किल हो जाता है
तर जाना होता है या तैर जाना होता है
दो हिस्सों में नहीं बस एक हो जाना होता है
जैसे मन के प्यासे हिरण को गँगा मिली हो
तब कहीं जाकर
उदासी का ये लिहाफ़
कोसों दूर हवा में लहराता हुआ
सन्नाटे की ख़ामोशी को चीरता हुआ
भीतर ख़ुशी की लौ को दैदीप्यमान करता है
टूटेे बिखरे हुओं को साध लेता है
इक ही धुन में सबको बांध लेता है
ये मेरी शिद्दत है
शिद्दत एकांत योगी की
छेड़ोगे तो बाँध लूंगा
इक ही धुन में सबको बाँध लूंगा
दिल दो हैं शिव और माया की तरह
बस धुन एक है जो जोड़े हुए है
सबको सबके साथ
आओ मिलो और छेड़ो फिर से वो राग
दिल झूम के गा उठे फिर बजाए गिटार

 

लेखक / लेखिका : ‪‎संगम

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