भुल्लकड़

भुल्लकड़

By | 2017-07-09T10:44:15+00:00 August 3rd, 2016|Categories: संस्मरण|2 Comments

 

उफ्फ… ये पेन भी न,पता नही कहाँ रखा गया मुझसे, पिछले आधे घंटे से खोज रहा हूँ  मिल ही नही रहा ।

तेज बारिश की वजह से बिजली भी गुल हो चुकी है मोमबत्ती की मंद रोशनी में चीजें ढूँढना काले बादलों से घिरे आसमान में तारा खोजने जैसा है एक तो कुछ चीजें तभी गायब हो जाती हैं जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है

दोनो मेज पर रखा सारा समान तितर-बितर कर चुका हूँ, और उसके ड्राज तीन तीन बार उड़ेल लिए हैं कहीं कुछ अता पता नही । कल ही दफ्तर में एक जरूरी आर्टिकल लिखकर देना है  और ये न जाने कहाँ लापता हो गया है जैसे सुबह के साढ़े तीन बजे इसे मेरे साथ लुकाछिपी का खेल,खेलने में बड़ा मजा आ रहा हो, इसे नही मालूम कि चीजें गुम होने का अहसास मेरे लिए बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी अपने को खो देना ।

 

कमरे में हर तरफ ढूंढने की सारी नाकाम कोशिशों के बाद थक-मांद कर फर्श पर बैठ गया हूँ । अब सोच रहा हूँ तुम यहाँ होती तो झट से ढूँढ देतीं और हंसते हुए कहतीं

 

” तुम्हारी ये चीजें रखकर भूल जाने की  आदत न मुझे बड़ी क्यूट लगती है क्योंकि  खोयी हुई चीजें मिल जाने पर तुम्हारी आँखों में खुशी की ये चमक देखकर अच्छा लगता है और जब तुम मेरा माथा चूमकर शुक्रिया कहते हुए मुझे अपनी बाँहो में कस लेते हो, सच मन करता है वो पल वहीं थम जाये”

 

अलार्म घड़ी की आवाज से आँखो में चल रही बीती यादों की फिल्म वहीं रुक गई ।

अनमने मन से उठकर पहले अलार्म बंद किया और फिर आँखे धुलने वाॅशबेसिन की तरफ मुड़ा। सामने लगे दर्पण में देखता हूँ कि इस बार पेन मैंने अपने दाँए कान में फंसा रखा है । वहीं खड़ा बहुत देर तक खुद पर हंसता रहा ।

 

#यादों की डायरी

 

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  1. hindilekhak August 4, 2016 at 12:06 am

    बहुत ही बढ़िया… ऐसा लोगों के साथ अक्सर होता है | खासकर कलम गुम होने के सन्दर्भ में …

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  2. प्रशांत बरसैया August 4, 2016 at 12:50 am

    अनेक आभार “हिन्दी लेखक” _/\_

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