मिट्टी की उर्वराशक्ति एवं उत्पादकता के लिए हरी खाद

मिट्टी की उर्वराशक्ति एवं उत्पादकता के लिए हरी खाद

By | 2016-09-18T16:43:41+00:00 September 4th, 2016|Categories: आलेख|Tags: |0 Comments

भारतवर्ष में हरी खाद का प्रयोग मिट्टी की उर्वराशक्ति एवं उत्पादकता बनाये रखने के लिए अति प्राचीन काल से चला आ रहा है। खेती की सघन कृषि पद्धति के विकास तथा दिनों दिन नकदी फसलों के अन्तर्गत क्षेत्रफल बढ़ने के कारण हरी खाद के प्रयोग में निश्चय ही कमी आई है, लेकिन बढ़ते ऊर्जा संकट, उर्वरकों की मूल्य में वृद्धि तथा गोबर की खाद जैसे अन्य जैविक स्रोतों की सीमित आपूर्ति से आज हरी खाद का महत्व और भी बढ़ गया है।
भारतीय कृषि में दलहनी फसलों का महत्व सदैव रहा है। दलहनी एवं गैर दलहनी फसलों को उनके वानस्पतिक वृद्धि के समय जुताई करके उपयुक्त पर सड़ने (अपघटन) के लिए मिट्टी में दबाना ही हरी खाद कहलाता है। इससे मृदा उर्वरता एवं उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलती है। ये फसलें अपनी जड-़ग्रन्थियों में उपस्थित सहजीवी जीवाणुओंद्वारा वायुंमडल में उपस्थित नत्रजन को सोखकर भूमि में एकत्र करती हैं। इसके अतिरिक्त दलहनी फसलें अपने विशेष गुणों जैसे भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने, प्रोटीन की प्रचुर मात्रा के कारण पौष्टिक चारा उपलब्ध कराने तथा मृदा क्षरण के अवरोधक के रूप मंे विशेष स्थान रखती हैं।

हरी खाद वालीफसलों की विशेषताएं

हरी खाद के लिए फसलों में निम्न गुणों का होना आवश्यक हैंः

 दलहनी फसलों की जड़ों में उपस्थित सहजीवी जीवाणु ग्रंथियाँ (गाठें) वातावरण में मुक्त नाइट्रोजन को यौगिकीकरण द्वारा पौधों को उपलब्ध कराती हो।
 फसल शीघ्र वृद्धि करने वाली हो।
 हरी खाद के लिए ऐसी फसल होनी चाहिए जिसमें तना, शाखाएँ और पत्तियाँ कोमल एवं अधिक हों ताकि मिटटी में शीघ्र अपघटन होकर अधिक से अधिक जीवांश तथा नाइट्रोजन मिल सके।
 चयनित फसलें मूसला जड़ वाली होनी चाहिए ताकि गहराई से पोषक तत्वों का अवशोषण हो सके।
 क्षारीय एवं लवणीय मृदाओं में गहरी जड़ों वाली फसलें अंतःजल निकास बढ़ाने में आवश्यक होती हैं।
 फसल सूखा अवरोधी के साथ जल मग्नता को भी सहन करने वाली होनी चाहिए।
 चयनित फसल पर रोग एवं कीट कम लगते हो तथा बीज उत्पादन की क्षमता अधिक हो।
 हरी खाद के साथ-साथ फसलों को अन्य उपयोग में भी लाया जा सके।

हरी खाद के लिए प्रयुक्त होने वाली प्रमुख फसले
दलहनी फसलों में ढ़ैंचा, सनई, उर्द, मूँग, अरहर, चना, मसूर, मटर, लोबिया, मोठ, खेसारी तथा कुल्थी मुख्य हैं। लेकिन जायद में हरी खाद के रूप में अधिकतर सनई, ढ़ैंचा, उर्द एवं मूँग का प्रयोग ही प्रायः हरी खाद के लिए प्रचलित हैं।

ढ़ैंचा
यह एक दलहनी फसल है। यह सभी प्रकार की जलवायु तथा मिट्टी में सफलता पूर्वक उगाई जाती है। जलमग्न दशा में भी यह 1.5 से 1.8 मीटर की ऊँचाई कम समय में ही प्राप्त कर लेती हैं। यह फसल एक सप्ताह तक उसे तेज हवा चलने पर भी 60 सेमी. तक का जल भराव भी सहन कर लेती हैं। इन दशाओं में ढ़ैंचा के तने से पाश्र्व जड़े निकल आती हैं जो पौधों को गिरने नहीं देती। अंकुरण होने के बाद यह सूखे को सहन करने की भी क्षमता रखती हैं। इसे क्षारीय तथा लवणीय मृदा में भी उगाया जा सकता हैं। हरी खाद के लिए प्रति हेक्टेयर 60 किग्रा. ढ़ैंचे के बीज की आवश्यकता होती है। ऊसर में ढ़ैंचे से 45 दिन में 20-25 टन हरा पदार्थ तथा 85-105 किग्रा. नाइट्रोजन मृदा को प्राप्त होता हैं। धान की रोपाई के पूर्व ढ़ैंचा की पलटाई से खरपतवार नष्ट हो जाते है।

सनई
बलुई अथवा दोमट मृदाओं (अच्छे जल निकास वाली) के लिए यह उत्तम दलहनी हरी खाद की फसल है। इसकी बुवाई मई से जुलाई तक वर्षा प्रारम्भ होने पर अथवा सिंचाई करके की जा सकती है। एक हेक्टेयर खेत में 80-90 किग्रा.बीज की बुआयी की जाती है। मिश्रित फसल में 30-40 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता हैं। यह तेज वृद्धि तथा मूसला जड़ वाली फसल है जो खरपतवार को दबाने में समर्थ हैं। बीज बुवाई के 40-50 दिन बाद इसको खेत में पलट दिया जाता हैं। सनई की फसल से 20-30 टन हरा पदार्थ एवं 85-125 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर मृदा को प्राप्त हो जाती हैं।

उर्द एवं मूँग
इन फसलों को अच्छी जल निकास वाली हल्की बलुई या दोमट भूमि में जायद ऋतु में बुआयी की जा सकती हैं। इनकी फलियाँ तोड़ने के बाद पौधों को खेत में हरी खाद के रूप में पलट देना चाहिए। प्रदेश में हरी खाद के लिए इनका आंशिक रूप में प्रयोग किया जा सकता है। बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर 15-20 कि.ग्रा. मूँग/उर्द बीज की आवश्यकता होती है। मूँग एवं उर्द से 10-12 टन प्रति हेक्टेयर हरा पदार्थ प्राप्त होता है।

हरी खाद हेतु सनई एवं ढ़ैंचा की उन्नतशील प्रजातियाँः
नरेन्द्र सनई-1
कार्बनिक पदार्थो से भरपूर, फसल भूमि में बीज बुआई के 45 दिन के बाद पलटने से 60-80 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से नाइट्रोजन प्रदान करने वाली, शीघ्र जैव अपघटन, पारिस्थितकीय मित्रवत, 25-30 टन प्रति हेक्टेयर हरित जैव पदार्थ, बीज उत्पादन क्षमता 16.0 कुन्तल प्रति हेक्टेयर प्रति पौध अधिक एवं प्रभावी जड़ ग्रंथियाँ, अम्लीय एवं सामान्य क्षारीय भूमि के लिए सहनशील तथा हरी खाद के अतिरिक्त रेशे एवं बीज उत्पादन के लिए भी उपयुक्त।

पंत ढ़ैंचा-1
कार्बनिक पदार्थो से भरपूर 60 दिन मंे हरित एवं सूखा जैव पदार्थ, प्रति पौध अधिक एवं प्रभावी जड़ ग्रन्थियाँ तथा अधिक बीज उत्पादन।

हिसार ढ़ँचा-1
कार्बनिक पदार्थो से भरपूर, 45 दिन में अधिक हरित एवं सूखा जैव पदार्थ उत्पादन, मध्यम बीज उत्पादन, प्रति पौध अधिक एवं प्रभावी जड़ ग्रन्थियाँ।

उर्वरक प्रबन्ध
हरी खाद के लिए प्रयोग की जाने वाली दलहनी फसलों में भूमि में सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता बढ़ाने के लिए विशिष्ट राइजोबियम कल्चर का टीका लगाना उपयोगी होता हैं। कम एवं सामान्य उर्वरता वाली मिटटी में 10-15 किग्रा. नाइट्रोजन तथा 40-50 किग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्टेयर उर्वरक के रूप में देने से ये फसलें पारिस्थकीय संतुलन बनाये रखने में अत्यन्त सहायक होती हैं।

हरी खाद देने की विधियाँः

(1) हरी खाद की स्थानीय विधि
इस विधि में हरी खाद की फसल को उसी खेत में उगाया जाता हैं जिसमें हरी खाद का प्रयोग करना होता हैं। यह विधि समुचित वर्षा अथवा सुनिश्चित सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं। इस विधि मे फसल को फूल आने के पूर्व वानस्पतिक वृद्धि काल (45-50 दिन) में मिटटी में पलट दिया जाता है। मिश्रित रूप से बोई गयी हरी खाद की फसल को उपयुक्त समय पर जुताई द्वारा खेत में दबा दिया जाता हैं।

(2) हरी पत्तियों की हरी खाद
इस विधि में हरी पत्तियों एवं कोमल शाखाओं को दूसरी जगह से तोड़कर खेत में फैलाकर जुताईद्वारा मिट्टीदबाया जाता हैं जो मिटटी में थोड़ी नमी होने पर भी सड़ जाती हैं। यह विधि कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयोगी होती है।

हरी खाद की फसलों की उत्पादन क्षमता
हरी खाद की विभिन्न फसलों की उत्पादन क्षमता जलवायु, फसल वृद्धि तथा कृषि क्रियाओं पर निर्भर करती हैं। विभिन्न हरी खाद वाली फसलों की उत्पादन क्षमता निम्न सारणी में दी गयी हैंः

सारिणीः हरी खाद के लिए उपयुक्त फसलें एवं उनसे प्राप्त होने वाले नत्रजन की मात्रा
फसल का नाम हरे पदार्थ की मात्रा
(टन प्रति हेक्टेयर)

नाइट्रोजन का प्रतिशत

प्राप्त नाइट्रोजन
(किग्रा. प्रति हेक्टेयर)

सनई

२० – ३० ०.४३ ८६ – १२९

ढैंचा

२० – २५ ०.४२ ८४ – १२९

उर्द

१०- १२ ०.४१

४१ – ४९

मूंग

८-१०

०.४८

३८-४८

ग्वार

२०-२५ ०.३४

६८-८५

लोबिया

१५-१८ ०.४९

७४-८८

कुल्थी ८-१० ०.३३

२६-३३

नील ८-१० ०.७८

६२-७८

 

—  डाॅ. सूर्य नाथ सिंह चैरसिया
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी

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