अदने आदमी की अभिलाशा

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अदने आदमी की अभिलाशा

By | 2016-11-22T05:57:35+00:00 November 22nd, 2016|Categories: कविता|0 Comments

चाह भी था फूलों सा बनना

खिलना, और सदा मुस्काना

फिर से मिट्टी में मिल जाना |

अंत सुनिष्चित है जब जग में

इसीलिए अब यह अभिलाशा

नहीं तेल की नाव बनाना

बर्फ षिला पर नहीं लिटाना

रूकना नहीं किसी प्रियजन हित

यथाषीघ्र तुम पार लगाना

अगर कोई लेना चाहे

गर इसको ऐसे

ज्ञान बढ़ाने की मनसा से

उन्हें हर्श से तुम दे देना

पर मेरा तुम नाम न कहना|

और अंत में

इसे जलाना पड़े अगर तो,

मुझे जलाना नहीं काठ से

बिजली की भठी बेहतर है|

और राख जो हाथ लगे

मिट्टी में दे डाल उसे

एक घना तुम बृक्ष लगाना,

अच्छा हो गर फूलों का हो

फल लगते हों द्य

और नहीं कोई पूजा करवाना |

नहीं बनूगा दैत्य,

रहूँगा मुक्त, दिव्य,

न होने पर भी

इसी धरा के मिटटी में मिल |

कहो अरे क्या हो पायेगा ? ■

– इन्द्र शर्मा

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