ममता की जीत

ममता की जीत

By | 2017-01-16T08:53:37+00:00 January 16th, 2017|Categories: संस्मरण|Tags: |0 Comments

नव वर्ष के आगमन की सुगबुगाहट दिसंबर महीने के आरम्भ से ही माहौल में. पैर पसारने लगती है। मेरे मन की  न जाने क्यों. कुछ अजीब सी  दशा हो जाती है। अच्छी तरह जानती हूँ कि समय अपनी चाल  से आगे बढ़ता ही है इसमें कोई नयी बात नहीं है । न ही कोई घबराने की बात है पर लगता है जैसे समय के साथ कुछ पीछे छूट सा रहा है। जहाँ एक तरफ़ नव वर्ष के स्वागत की बात मन में आती है,एक पुलक सी जगती है भीतर कहीं ,वहीं एक अहसास इस बात का भी होता है कि कुछ था जो गुज़रने वाला है

अजीब लग रही होगी न आपको मेरी बात !गया साल और नया साल के बीच की कश-म-कश !

इस बार कुछ अलग ही हो रहा है पुराने साल से अलिवदा कहना न जाने क्यों इतना बुरा नही लग रहा शायद इसलिए की इस बार मुझे एक ऐसा उपहार मिला है, जो हमेशा हमेशा मुझे इस साल की याद दिलाता रहेगा।  ऐसा नही है की कुछ बुरा हुआ नही ,पर जो भी हुआ वो ख़ुशी की तुलना में. कुछ भी नही, था।

२०१६ मुझे और मेरे परिवार को जो  देकर गया और जो मुझसे ले गया वह सोचती हूँ तो प्राप्ति का पलड़ा भारी ही लगता है। उम्र के इस पड़ाव पर जो मुझे चाहिए था ,जिसकी  कई बरस से रह देख  रही थी वो मिला मुझे।  मुझे मेरा प्यारा सा नाती मिला इस साल। मेरी बेटी लंदन में रहती है और  जुलाई में माँ बनने वाली थी। शादी के नौ साल बाद। उसके पास उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था लिहाज़ा मैंने  और मेरे पति ने बेटी के पास जाने की बात सोची। कैसे रोकती खुद को! मौका ही ऐसा था।

मैंने अपने विद्यालय में छुट्टी के लिए आवेदन पत्र दे दिया। नौकरी पक्की थी ,तो कोई अंदेशा भी नही. था की छुट्टी नहीं मिलेगी। बेहद खुश थे हम दोनों।

लगभग पूरा महीना बीत  जाने के बाद पता चला कि मुझे केवल बीस दिन की ही छुट्टी दी जा सकती है और साथ में. जून की गर्मी की छुट्टियां सब मिला कर  कुल एक महीना। आवेदन तीन महीने के लिए किया था।

बहुत हाथ पैर मारे लेकिन बात नहीं बनी। नौकरी सरकारी जो नहीं थी खैर ,सोचा जाते हैं बेटी को यहीं ले आएंगे। अब ख़ुशी तो बहुत बड़ी थी पर नौकरी अपनी जगह है महंगाई के दौर में छोड़ना मुश्किल है।उसपर पति भी रिटायर हो चुके थे। मन दुखी तो था ,पर जाने की तैयारी कर  ली।

१ जून की फ्लाइट थी। पहली बार विदेश जाने की,हवाई यात्रा करने की ख़ुशी कुछ कम नहीं थी ,और फिर मेरी दो-दो बेटियां हैं वहां उनका गृहस्थी भी पहली बार देखने वाली थी। आठ घंटे का सफर काफी रोमांचक था।

वर्जिन अटलांटिक में. लाल और सफेद रंग  के वस्त्र पहने सुंदर  युवतियां सेवा में तत्पर थीं।  आरामदायक सीट ,सामने लगा स्क्रीन और विमान की बाहरी -भीतरी बनावट ,साज- सज्जा सब कुछ रोमांचित करने वाला था।

विमान ने नियत समय पर उड़ान भरी।

कितना अच्छा लग रहा था! क्या बताऊं ! थोड़ी देर के लिए कानो में हवा सी भर गयी ,अजीब लगा पर डर बिलकुल नहीं लगा। बाहर का नजारा  अद्भुत था पर अकल्पनीय नही।सारा दिल्ली शहर जैसे सिमट कर  एक ही जगह आ गया था। छोटी -छोटी इमारते. ब्च्चो. के ब्लॉक-बिल्डिंग जेम जैसी लग रही. थीं। आह ! बेहद खूबसूरत ,नया अनुभव था ,बहुत अच्छा लग रहा था।  कुछ पल के लिए तो मैं बच्ची बन गयी।

उचक-उचक कर  खिड़की से बाहर हर पल छोटे होते और फिर आँखों से ओझल होते दृश्य को अपलक देखती रही।

कुछ देर बाद सब दिखाई देना बंद हो गया और मैंने स्वयं को बादलों. के बीच पाया। अलौकिक था सब ,लगा की इंद्र देव के दरबार में पहुंचने ही वाली हूँ बस !बनते–बिगड़ते बादल कभी  हाथी तो  कभी घोड़ा बन जाते यह सब देखते दिखाते सफर बड़े मज़े से कटा। सात घंटे से अधिक का समय बीत चुका था! अब बेचैनी बढ़ने लगी। सीटबेल्ट बाँधने की घोषणा हुई तो दिल बल्लियों उछालने लगा। अब पूरे एक साल बाद बच्चों से मिलने की ख़ुशी और गहरा गई। नीचे होते प्लेन से अब लन्दन शहर की पहली झलक मिली। विश्वास नही हो रहा तथा कि हम लंदन पहुँच चुके हैं।  साफ-सुथरा व्यवस्थित शहर! आखिर हवाई जहाज़ लैंड हुआ।

नयी जगह ,अनजान लोग,फिर पहला अनुभव। नियम के अनुसार कोई खाद्य पदार्थ ले जाने की मनाही है ,तो बच्चों ने मन किया था कुछ भी लाने  के लिए और बहुत डराया भी था कि  पकडे गए तो जेल में डाल देंगे,यहाँ का कानून बहुत सख्त है। पर मन नही मन सोचा बच्चों को देश की चीज़ें  कहाँ मिलती होंगी खाने को थोड़ा बहुत ले जाने से क्या होगा,सो लेकर आयी थी।  अब ले तो आई लेकिन जान निकली जा रही थी। राम का नाम जप रही थी कि कहीं पकड़े  न जायें। खैर रही कुछ नही हुआ और हम बाहर निकल गए.

सामने बेटियां,दामाद सब खड़े थे। इतने दिन बाद सबको देखा आँखे नम हो आयीं।  मेरी ही नहीं बेटियों की भी। सब बहुत खुश थे।

निम्मी ,मेरी बेटी जिसके प्रसव के लिए मैं  आयी थी,उसके घर गए सब। खाया पीया ,बातें की फिर रात को बड़ी बेटी अपने घर चली गयी।

अगले दिन से ही घूमन फिरना शुरू हो गया और साथ ही शुरू हो गयी हमें. अपने अपने घर रखने के लिए दोनों बेटियों की प्यार भरी खींचातानी। एक सप्ताह के बाद बड़ी बेटी के यहां गए। वहां कार पञ्च दिन रुके फिर वापस निम्मी के पास आ गए ,क्योकि फ़िलहाल उसे हमारी ज़रूरत थी। जून की १५ तारीख थी , उसने एक जगह घूमने का प्लान बनाया। होटेल  बुक करवा दिया मैंने बहुत मन किया पर नही माने वे दोनों कहने लगे की बेबी आने के बाद कहि नही जा पाएंगे। अगले दिन डॉक्टर के साथ अपॉइंटमेंट थी उसकी।

सुबह दस बजे जाना था उसे मुझे भी चलने को कहने लगी ,बोली आप भी देखना बेबी को स्कैन में। मैं उत्सुक थी देखने को   मैं उत्सुक थी देखने को की,चली गयी उसके साथ। स्कैन देखा ,एक बार बेबी हिला मन खुश खुश हो गया देखके। पर दूसरे ही पल देखा की डॉक्टर कुछ असम.जस में. है। बेटी को भी लगा कुछ गड़बड़ है। पूछ,बेबी ठीक है न डॉक्टर तो जवाब मिला ग्रोथ हुई ही नहीं ३ २ वे   जबकि ३५ वा सप्ताह कल रहा था।  मुझे तो जैसे किसी ने ऊपर से नीचे पटक दिया हो। मेरी आँखों, से आंसू निकलने लगे,बेटी ने खा मां अभी स्पेशलिस्ट देखेगा शांत रहो।  मुझे ढाढस बांध रही थी ,उसके अपने मन में. न जाने क्या चल रहा होगा। दूसरे डॉक्टर ने देखा और खा डिलीवरी जल्दी करनी होगी। २४ तारीख को।  डर के मारे बुरा हाल था। घर लौटे तो बार बार मन में. यही ख्याल आता रहा की हे भगवान एक सप्ताह ठीक  -ठाक निकल जाये।

इस बीच तीन बार अस्पताल जाना पड़ा। किसी तरह दिन बीते और वः दिन भी आ गया जिसका इंतज़ार था।

२५ तारीख की सुबह नन्हे मेहमान ने दस्तक दी और हम सब ख़ुशी से झूम उठे। २५ तारीख की सुबह नन्हे मेहमान ने दस्तक दी और हम सब ख़ुशी से झूम उठे। शाम होने का इंतज़ार करने लगे ,क्योंकि मिलने का समय शाम चार बजे था। अस्पताल से दामाद ने नन्हे की तस्वीर भेजी,देखकर ख़ुशी से फुले न समाए  हम सब। थोड़ी देर बाद दामाद का फोन आया ,पता लगा कि निम्मी को कोई इंफेक्शन हो गया है और हो सकता है कि बच्चे को भी हो इसलिए खून की जांच करनी होगी जिसकी रिपोर्ट पांच दिन बाद मिलेगी। दिल धड़कने लगा ,न जाने क्या है ईश्वर के जी में। बच्चा भी कमज़ोर था ,तो उसे भी अलग रखा गया है।

अब हमे. यह भी न पता था कि हम कब मिल पाएंगे। जिस बीमारी का नाम लिया जा रहा था वः जानलेवा थी।

किसी से खा तो नहीं पर न चाहते हुए भी बुरे-बुरे ख्याल मन में आने लगे।

जैसे तैसे रात बीती।  सुबह अछि खबर मिली कि बच्चा माँ के पास आ गया है। कम से कम इतनी तसल्ली मिली कि बेचारी निम्मी को कुछ तो सुकून मिला होगा।अंदाज़ा था मुझे कि उसकी क्या हालत हो रही होगी।

मेरी जो हालात थी वः तो मई किसी को बता भी न सकी ,क्योंकि नेहा,मेरी बड़ी बेटी भी दरी हुई थी लेकिन कह तो कुछ वो भी नहीं पा रही थी। शायद उसे मेरी भी चिंता थी कि मम्मी दुखी होंगी।

खैर सब कुछ न लिख पाऊँगी ,वो  दिन याद करने से भी डर लगता है ,बुरा समय था ,बीत गया। अछि बात यह हुई कि वहां के कुशल चिकित्सकों ने केस को संभल लिया और माँ -बेटा  ठीक होकर आठ दिन बाद घर आ गए।

जाने कितनी मन्नतें मांग लीं ,जाने कितने व्रत उपवास मनस डाले इस बीच।

जब सब कुछ थोड़ा संभला तब मुझे अपनी नौकरी की याद आयी ,बेटी को देखभाल कि आवश्यकता थी। छुट्टी बढ़ने के लिए आवेदन भेजा ,लेकिन बात बनी नही।  नौकरी और ममता की जंग में भला कौन जीतता !ममता की जीत हुई और हमने वहीं रुकने का फैसला लिया।

नौकरी चली गयी,दुःख भी हुआ क्योंकि इस उम्र में दोबारा नौकरी ढूँढना और मिलना लगभग नामुमकिन था ,लेकिन जो मुझे मिला वह मेरे लिए वरदान से कम न  था। मेरी बेटी मौत के मुँह से बाहर आयी यह एक चमत्कार ही था और मेरे नन्हे नाती को ममता का वरदान मिला।

किसी भी नौकरी की कौन बिसात इस ख़ुशी के आगे !

— मंजू सिंह

 

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