मुस्कुरा कर मुझे ना निहारा करो

मुस्कुरा कर मुझे ना निहारा करो

By | 2017-07-29T15:50:31+00:00 February 2nd, 2017|Categories: गीत-ग़ज़ल|0 Comments

मुस्कुरा कर मुझे ना निहारा करो
गीत कैसा पढूँ कुछ ईशारा करो

अभी तो निशा का प्रथम दौर है
चाँद तारे गगन में ना आये हुये
फूल हसते रहे दिन में जो डाल पर
देखता हूँ सभी सिर झुकाये हुये
रात रानी कभी भी खिले ना खिले
फिर मुझे कोई भाव मिले ना मिले
मन हो जब भी तुम्हारा
जो मिलने का तो
कंगनों की खनक से पुकारा करो
गीत कैसा पढूँ कुछ ईशारा करो

कहाँ तक जलेगा मेरा मन वियोगी
अभी तो शुरू ही हुआ है अँधेरा
उस मुहूर्त को लेकर ना बैठीं रहो
अभी तो बहुत दूर है रे सवेरा
लग ना जाये कहीं ग्रहण मेरे लिये
हाँ मैं डरता हूँ इस बात से ओ प्रिये
मेरी हर बात पर
रूठ जाती हो क्यों
रूठ कर मुझसे यूँ ना किनारा करो
गीत कैसा पढूँ कुछ ईशारा करो

मुस्कुरा कर झुका लो नयन बाबरे
गीत का हार स्वर्णिम पिन्हा दूँ तुम्हे
चंद पल में बना दूँ नवेली दुल्हन
और दुल्हन से ज्यादा सजा दूँ तुम्हे
जिस नगर की डगर से प्रिये आएंगे
उस नगर की डगर पुष्प बिछ जाएंगे
सोलह श्रंगार करके तुम
मेंहदी रचा लो
फिर रचे हाँथ से लट संवारा करो
गीत कैसा पढूँ कुछ ईशारा करो
मुस्कुरा कर मुझे ना निहारा करो

— विशाल समर्पित

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