डायरी के पन्नों से

डायरी के पन्नों से

By | 2017-07-09T10:44:15+00:00 February 19th, 2017|Categories: संस्मरण|Tags: |0 Comments

कभी कभी सोचती हूँ की हम समझदार है सब समझते है ।सत्य क्या है झूठ क्या है धार्मिक प्रवचन सुनते है अच्छी किताबे पढ़ते है फिर इन सब अच्छे गुणों के बाद ऐसी क्या परिस्तिथियां बन जाती है की हमसे गलतियां हो जाती है अपने कार्यस्थल हो या घर हमारा क्रोध पर नियंत्रण नही रहता।
जैसे जैसे जिंदगी की गाढ़ी आगे बढ़ती है ना तो हमारी उम्र कम होती है साथ ही हम मौत की ओर अग्रसर होते है इस बीच हर घटनाओ से हमे कुछ अनुभव भी मिलते है।
हमारे आस पास सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से भरे हुए लोग रहते है हम दोनों के प्रभाव में आते है पर दिल को चुभती है गर किसी की बाते तो हमारा दिमाग और दिल यंही कमजोर पढता है।नकारात्मक ऊर्जा से भरे कुछ लोग आपको परेसान करते है फब्तियां कसते है ना चाहकर भी हम आहत हो जाते है कारण भी है कोई ऋषि ,साधू सन्यासी या भगवान् तो नही है हम मात्र एक आम इंसान है।और ना ही भगवान् कृष्ण की तरह हम दर्शक बन नही देख सकते फिर विज्ञान भी तो कहता है ना की हर क्रिया की प्रतिक्रया होती है।
बेहतर है की नकारात्मक लोगो से ही दूर रहा जाय क्योकि इन सब की वजह से ना चाहकर भी हमारा मन दूषित हो जाता है। क्योकि किसी का मन किसी के नियंत्रण में नही रह पाता विभिन्न भावों को हम आने से नही रोक सकते वे स्वयं प्रस्फुटित होती है।

— शालिनीपंकज दुबे

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