हम तरक्की ही कर रहे हैं न

हम तरक्की ही कर रहे हैं न

By | 2017-07-29T15:59:56+00:00 February 25th, 2017|Categories: विचार|1 Comment

मनुष्य का जीवन कई सारी प्रक्रियाओं का संयोग है। भरतीय समाज इस संयोग को भली भांति समझता भी रहा है, और इसी के आधार पर रहन सहन और समाज का निर्माण भी करता रहा। लेकिन कालान्तर में पाश्यात्य तथा तथाकथित सभ्य समाज के पीछे पीछे भागनेे की होड़ में बहुत कुछ मूल्यवान पीछे छूटता चला गया। इसका एक कारण हमारे समाज का पूर्ण ज्ञान न होना।

आज कल हर तरफ एक विज्ञापन देखने को मिल जाता है वस्तु का नाम है एयर प्यूरीफायर ( हवा स्वच्छ करने की मशीन )। अब जब हमने हवा अशुद्ध कर ही दिया है तो ऐसी मशीनों की आवश्यकता तो पड़ेगी ही। ठीक ही है, होना भी चाहिए सबको शुद्ध हवा मिलनी ही चाहिए।
मैंने इसके मूल्य के बारे में पता किया तो ज्ञात हुआ 3000 रूपये से लेकर 20,000 रुपये या उससे अधिक हैं इनके मूल्य। अब यहाँ आके मेरी परेशानी शुरु हुई, जब मैंने हिसाब लगाया।
प्रोडक्ट का मूल्य – 3000 रुपये कम से कम।
बिजली बिल एक साल का – 3000 ( हवा तो 24 घण्टे शुद्ध चाहिए ही न ।) क्योंकि मशीन पुरे साल लगातार काम कर रही है, एक साल में ख़राब हो जाएगी, और वह एक प्लास्टिक का कूड़ा बन जाएगा। इसके बावजूद यह वस्तु तो एक गरीब इन्सान खरीद ही नहीं पाएगा।

तो यह मान लें कि यह वस्तु सिर्फ अमीरों के लिए रह जाएगा।

यह कौन सा समाज बना रहे हैं हम, हम सच में तरक्की ही कर रहे हैं न।
पहले केमिकल खादों का प्रयोग करके जमीन अशुद्ध किया। फिर शुद्धता के नाम पर ऑर्गेनिक खेती शुरू किया । पानी अशुद्ध किया और शुद्धता के नाम पर बोतल बंद पानी का व्यापार किया। शुद्ध खाना और पानी आम इन्सान के हक़ से बाहर कर दिया। कितने लोग खरीद पाते हैं ऑर्गेनिक अनाज, सब्ज़ी और बोतल बंद पानी। अब बारी है हवा की, हवा अशुद्ध करते जा रहे हैं और शुद्ध हवा के विकल्प में व्यापार किया जाएगा एयर प्यूरीफायर का।

सब कुछ गरीब के हाथ से निकलता जा रहा है। और सिर्फ गरीब ही नहीं इन सब चीजों का देर सबेर सब पर असर पड़ेगा ही। कोई अछूता नहीं रह जाएगा।
जब ऐसी सोचों से मस्तिष्क क्षुब्ध हो जाता है, मेरा बार बार यही सवाल उठता है …
हम तरक्की ही कर रहे हैं न।

मेरे दिमाग में सवाल आया, क्या इतने पुराने इंसान समाज को कभी इस बात की चिंता न हुई होगी, अगर हुई होगी तो क्या किया होगा ? इसी सन्दर्भ में मैंने कुछ जानकारी इकठ्ठा करने की कोशिश की जो सच में आश्चर्यजनक है।

उत्तर था तुलसी का पौधा …

जी, ढेर सारी औषधीय गुणों वाला तुलसी का पौधा एक अतिविकसित एयर प्यूरीफायर का काम करता है।
मूल्य प्रतिवर्ष – गरीबों के लिए मुफ्त, अमीरों के लिए 100 / 200 रूपया ( जो की गमले की कीमत है )

अब जानते हैं कैसे …

1. तुलसी का पौधा भी अन्य वनस्पति की तरह हवा में विद्यमान कार्बन डाई ऑक्साइड, प्रकाश और पानी की उपस्थिति में पेड़ पौधे के पत्ते में विद्यमान क्लोरोफिल के साथ अभिक्रिया करके ऑक्सीजन बनाता है।
2. तुलसी का पौधे के जड़ में अधिक मात्रा में पानी पड़ने पर भी सड़ता नहीं है। फिर भी तुलसी को, हमेशा स्थान को ऊंचा अथवा चबूतरा बना के लगाया जाता ही, ताकि पानी आसानी से बह सके।
3. तुलसी का चबूतरा ऊँचा होने से अर्घ्य देने समय मिट्टी के छींटे शरीर पर नहीं पड़ता।
4. घर के सभी लोग अर्घ्य दिया करते थे, मतलब अपने हिस्से के लिए ऑक्सीजन के लिए पौधे को एनर्जी देते थे।
5. अर्घ्य देने का वक़्त सुबह सूर्योदय का होता था। जब सूर्य किरणें सबसे ज्यादा तिरछी होती हैं, पराबैगनी किरणों की मात्रा कम होती है। कुछ लोग कभी भी अर्घ्य देने लगते हैं, यह सर्वथा गलत, क्योंकि सूर्य में पराबैगनी किरणें बढ़ जाती है।
6.अर्घ्य नहा कर दिया करते थे, यानि शरीर को साफ़ करके आप लगभग 2 मिनट के लिए सूर्य के सामने विटामिन डी लेते हैं।
7. उसी क्षण आप अपने लिए ऑक्सीजन भी बनाने का काम शूरू किया और सबसे शुद्ध ऑक्सीजन तुलसी के समीप रह के ले लिया।
8. अर्घ्य के दौरान एक प्रदक्षिणा की क्रिया होती है, मतलब एक ही जगह खड़े होकर 360 डिग्री घुमना या तुलसी के पौधे का गोल चक्कर लगाना। इस क्रिया में पीठ का हिस्सा भी सूर्य के समक्ष होता है और आपके पीठ को भी विटामिन डी मिल जाता है।
9. अर्घ्य की क्रिया में आँखों को भी विटामिन डी प्रदान कराने की व्यवस्था है। सूर्य चाहे सबसे तिरछा है, फिर भी उसकी सीधी रौशनी आँखों को नुकसान पहुँचा सकती है। इसलिये आँखों के सामने एक पर्दा अंजलि से गिरते पानी से बनाया जाता है, जिससे आँखों को विटामिन डी तो मिल जाता है, लेकिन नुकसान नहीं पहुँचता।
10. एक तुसली का पौधा एक साल में अपने आयु को प्राप्त कर जाता है, इसलिए उसे हर एक साल बदल दिया जाता है।
11. तुलसी के औषधीय गुण की जानकारी आपको पहले से ही है।
मतलब एक पौधा और कई सारे लाभ …

यह तो हो गई घर की ऑक्सीजन मशीन … हमारे पूर्वजों ने ऑक्सीजन की पूरी फैक्ट्री भी निर्धारित कर रखा था। जो आज के समाज में सोच के बाहर है। और गरीब और अमीर के लिए कोई अलग अलग व्यवस्था नहीं थी।

तो ऑक्सीजन की फैक्ट्री थी, भूतों वाला पीपल और बरगद का पेड़।

पीपल और बरगद के पत्ते अपेक्षाकृत बड़े होते है, इसलिए प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में अधिक मात्रा में ऑक्सीजन बनाते हैं लेकिन रात्रि में उसी मात्रा में कार्बन डाई ऑक्साइड भी छोड़ते हैं। इसलिए इन पेड़ों को गांव के बाहर लगाया जाता था। आज भी गांव से जुड़े लोगों से इस बात की प्रमाणिकता की जा सकती है । क्योंकि रात में इन पेड़ों के नीचे हवा में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा अधिक होती है, और साँस लेने में तकलीफ होती है तो लोगों ने पेड़ों के नीचे भूत प्रेत का वास समझ लिया।

वैसे तो ये बड़े पेड़ बरसात के पानी से साल भर ज़िंदा रह लेते हैं। लेकिन बरसात न हो, कम हो ऐसी परिस्थिति से सामना करने के लिए बड़ी ही सुन्दर व्यवस्था थी। इसकी जिम्मेदारी दी गयी थी स्त्रियों को। साल के एक दिन बरगद /पीपल पेड़ की पूजा की जाती है और सब औरतें उसमें पानी डालती हैं।

क्या सुन्दर व्यवस्था थी, एक छोटा फैक्ट्री हर घर में और एक बड़ा फैक्ट्री हर गांव में। और उन फैक्ट्री को चलाने की जिमेदारी ऐसी, किसी एक पर बोझ भी नहीं पड़ा और काम भी सुचारू से सदियों तक चलता रहा।

तब तक चलता रहा, जब तक हमें ये न समझा दिया की हम मूर्खाधिराज है। हम पेड़ों की पूजा करते हैं। कौन ऐसा सभ्य इंसान पेड़ की पूजा करता है। उन्होंने निर्णय कर लिया हम बेवकूफ हैं, और हमने आँख बंद करके उनपर यकीन भी कर लिया।

अब तो हमें ही निर्णय करना है … भेड़ चाल चलना है या रुकना है, समझना है, देखना है।

10000 का एयर प्यूरीफायर लगाना है या मुफ्त का। सबके लिए सोचना है या सिर्फ खुद का।

एक छोटा बदलाव करके देखें जीवन में, थोड़ा वक्त लगेगा लेकिन जीवन स्तर में सुधार अवश्य होगा।

प्रकाश संश्लेषण क्रिया
कॉर्बन डाई ऑक्साइड + पानी + प्रकाश+क्लोरोफिल → ग्लूकोज + ऑक्सीजन + पानी + क्लोरोफिल ।

– क. पाठक

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  1. कल्पना भट्ट February 27, 2017 at 7:55 am

    बहुत अच्छा लेख ।

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