छोड़ चला मैं

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छोड़ चला मैं

By | 2017-04-15T12:53:01+00:00 April 15th, 2017|Categories: कविता|3 Comments

बीच भंवर में, एक समर में
अपने पथ को छोड़ चला मैं
गांव की गलियां,खिलती कलियाँ
बीती बतियाँ छोड़ चला मैं ।

आम की बगिया,दूध की नदियां
ताल-तलैया छोड़ चला मैं
बहती पुरवईया , सोन चिरईया
तपती दोपहरी छोड़ चला मैं ।

माँ की ममता,भ्रात की समता
बाप तन मन छोड़ चला मैं
खुशियों के मेले,हंसी ठिठोले
बहन पराई छोड़ चला मैं ।

दोस्तों की यारी,राधिका प्यारी
गोपियाँ सारी छोड़ चला मैं
उपजाऊ धरती गांव की मिट्टी
छोड़ चला , परदेश चला मैं ।

– राघवेश यादव ‘रवि’

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3 Comments

  1. Manju Singh May 12, 2017 at 7:53 pm

    atyant bhavbhari sunder prasturi !!!

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय

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  3. Sanjay Saroj "Raj" March 8, 2018 at 12:58 pm

    “शब्दों” का सटीक और सुन्दर चयन

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