पगली

पगली

By | 2017-05-11T08:59:15+00:00 May 11th, 2017|Categories: कहानी|Tags: |0 Comments

वीरेंद्र काम से घर लौटा ही था,अभी ठीक से घर के भीतर पाँव भी नहीं रखा की घर में मच रहे शोर गुल से आग बबूला हो गया …..  बात ही कुछ ऐसी थी,वीरेंद्र की मां चिल्ला चिल्ला कर रो रही थी,

बेटे को घर आते देख मानो सारे जख्म किसी ने कुरेद दिए हो…

अब न कुछ किसी को बता रही थी न फिर खुद की जगह से हिलने को तैयार थी l वीरेंद्र के बहुत मनाने समझाने के बाद कुछ बोलने को तैयार हुई ..

इसे इसके बाप के घर क्यों नहीं छोड़ आता बेटा…

इसने आज खौलता पानी गुसरखाने में रख दिया… अरे उसमे ठंडा पानी नहीं मिलाना था ? ऐसी बेवकूफ है मुझे

नहीं पता था , खाल उधड़ गई बदन की ….😢

इतना सुनते हीे छड़ भर भी विलम्ब न करते हुए वीरेंद्र ने चार छ: थप्पड़ पत्नी गीता को रसीद कर दिए…

तू MA पास हे पढ़ी लिखी है , भला ऐसा कर कैसे सकती है.. पहले तो ये सब नहीं करती थी ? आखिर चाहती क्या है बता ? अगर मेरे साथ गुजारा नहीं होता तेरा तो चल पहुचा देता हूँ तुझे तेरे मायके , जब अकल ठिकाने आ जाय तो बता देना लिवा आऊंगा,पर अब एक छड़ भी तुझे यहाँ ठहरने नहीं दूंगा…. !!

इतना बोलते हुए वीरेंद्र जल्दी जल्दी कपडे समेटे और उसे एक झोले में रखे जा रहा था….. अब तक तो सिर्फ वीरेंद्र की मां के ही रोने की आवाजें आ रही थी,अब गीता और दो बच्चे लगातार चीख चीख कर रोये जा रहे थे…

बात सच भी थी पिछले एक हफ्ते से अचानक व्यवहार बदल गया था गीता का , जिसे दिन भर के काम से छड़ भर भी फुर्सत न रहती थी वो अब चुप चाप एक कोने में दिन के दिन बैठी रहती है ….. कौन जाने किस मनहूस घडी का छाया पड़ गया था उसपर..

मां के रोने की आवाज अब शांत हो चुकी थी और समझाते हुए वीरेंद्र से बोली…

देख बेटा अब पढ़े लिखे होने का फायदा ही क्या जो भीगे हाथ से कपडे स्त्री करने लग जाओ तो फिर यही होगा न ???

और फिर जमीन पर धड़ाम से गिरी सो अलग…

पर अब तो महीनो होने को हैं , पूरे 15 दिन दवा चलानी पड़ी थी मेने देख भाल की थी बिस्तर से उठ न पा रही थी,वो तो भला मानो बंगाली बाबू का जो कम खर्चे

में निपट गए ,नहीं अगर शहर जाना पड़ता तो हज़ारो का खर्चा होता…

वीरेंद्र जो की अब सारे कपडे समेट चुका था उत्तर देते हुए कहा.. .. तू फ़िक्र न कर अम्मा अब इसे इसके घर छोड़ कर आऊंगा और बताऊंगा इसकी करतूत इसके भाइयो से… वही सम्हाले इसे मुझसे अब और सहा नहीं जाता..

वीरेंद्र की आधी बाते घर के बाहर निकलते हुए ख़त्म की.. गीता का हाथ पकड़े लंबे कदमो से खींचता चला जा रहा था… अब तो बच्चों की रोने की आवाजें चीखों में बदल चुकी थी और गीता तो बेजान हो चुकी थी,वो तो न इन सब का विरोध कर रही थी न ही समर्थन कोई क्रिया कोई प्रतिक्रिया नहीं ….

गीता को भाई मोहन के घर आये 1 हफ्ते बीत चुके थे और यहाँ तो उसकी हालत और भी बत्तर हो चुकी थी,भाई सुबह होते ही अपने काम को निकल जाता और उसकी पत्नी आरती अपने काम में लग जाती,1 छोटा बच्चा जो स्कूल की और चल देता था…

अब करते भी क्या ? दवा दारु झाड़ फूंक सब करा रहे थे…

सुबह के 10 बज चुके थे और गीता चुप चाप चारपाई पे बैठी उस भोजन को देख रही थी जो उसे आरती ने खाने को दिए थे…

इतने में कुछ कपड़ो को सहेजते आरती ने बोला…

अरे खा लो घूरो मत सब कुछ तो है क्या चाहिए खाती क्यों नहीं हो ?…….तंग कर के रख दिया है,जिंदगी नर्क हो गई है,अब इन्हें रोटीयाँ तोड़ कर खिलाये या अपना काम देखे,जब सामने रख दिया तो खाने में मेहनत क्या है ?…. !!

शहर ले जा कर डॉक्टर को दिखाया भी दवा भी लादी,अब क्या करें ? हे भगवान् ये किस जनम का बदला ले रहा तू मुझसे…?? करे कोई भरे कोई,मेरी क्या गलती थी फिर क्यों इस नरक में फसां दिया !!

मुझसे न होगा ये सब,आने दो कहे देती हूँ कि मुझे भी आराम चाहिए कोई मशीन नहीं हूँ में,कुछ दिन मुझे भी अपने भाइयों के यहाँ पहुचा दें अरे इस बवाल से कुछ

दिन तो पीछा छूटे…!!

गीता सर नीचे किये चुप चाप ये सब सुनी जा रही थी,न कुछ हाँ न कुछ न बिलकुल खामोश मौन गुम सुम..

कुछ देर बैठी रही थाली में रखे भोजन तो अब सूख ही

चुके होंगे पर उसी दशा में पड़े थे जैसे आरती उसे खाने को दे गई थी…

आरती वहां से जा चुकी थी और अब चारो और एक अजीब सी खामोशी थी… अब तक तो दिन भी चढ़ चुका था आज धुप भी बहुत अच्छी थी,मौसम सुहाना था l

गीता चुप चाप चारपाई से उठी और चौखट पर करते हुए

बाहर आ गई कुछ देर कड़ी इधर उधर देख रही , और फिर धीरे धीरे कदमो से वहां से आगे बढ़ती गई…

अब उसे पूरे गाँव के लोग पगली कह कर चिढ़ाते हैं तो वो चीखते चिल्लाते उनकी और लपकती है…

कुछ दिन पूर्व किसी बच्चे ने उसके सर पर पत्थर से मार दिया था….. खून से लॉफ्ट सर पकड़े वो चिल्ला चिल्ला रोये जा रही थी पर अब सब वहां से नौ दो ग्यारा हो चुके थे…

आज भी वो प्रायः सडको पर गाते बजाते दिख जाती है किसी रहम दिल ने कुछ खिला दिया तो खा ली नहीं तो कोई शिकायत नहीं उसे बिलकुल मस्ती में बिंदास…

– मृदुल चन्द्र श्रीवास्तव

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