पशु का अंतर्मन

पशु का अंतर्मन

By | 2017-05-12T09:00:10+00:00 May 11th, 2017|Categories: कविता, कहानी|Tags: |0 Comments

सोच रहा होगा पशु मन में
मुझको पशु कैसे कहते हैं मानव

खाल मानव की पहने घुमतें
मानव की खाल में हैं सब दानव

इंसानो से प्यार नहीं
घर में बुजुर्गो का सम्मान नहीं

पाल रहे पशुओं को पेट कहते हैं
पर क़ैद करके ! क्या यह अत्याचार नहीं

गले में पट्टा डाल कर कहते
प्यार करतें हैं पशुओं से ऐसे

जंगल वन सब काट चुके है
अत्याचार अपना दिखा चुके हैं

कहीं धर्म का चोला ओढ़े
पशु बचाओ का अभियान चला रहे

कहीं लेख , कहीं आलेख,
कलम अपनी तराश रहें हैं

पशुओं से गर प्यार करते हैं
फिर क्यों उनका व्यापार करते हैं

बनाओ फिर से जंगल वन अब
पशुओं को दो अपने अधिकार ।।

— कल्पना भट्ट

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