छायावाद का पुनर्मूल्यांकन और मुक्तिबोध

छायावाद का पुनर्मूल्यांकन और मुक्तिबोध

By | 2017-05-13T08:47:38+00:00 May 12th, 2017|Categories: आलेख|1 Comment

हिंदी-साहित्य के इतिहास में छायावाद की चर्चा शुरू से ही अपने चरम पर थी। इसके दो मुख्य कारण हो सकते हैं। पहला- छायावाद का नामकरण एवं दूसरा उसकी प्रवृत्तियों का विश्लेषण। दोनों ही शर्तों में छायावाद केंद्रियता का विषय बना रहा। इसलिए विद्वानों ने अपनी सूझ-बूझ के साथ छायावाद के शोध कार्य में जुट गये। छायावाद के प्रारम्भिक दौर में ही आचार्य शुक्लजी जैसे मेधावी आलोचक अपनी सीमाओं के कारण छायावादी काव्य को संकुचित अर्थ में देखने लगे। छायावादी काव्यधारा को मात्र एक शैली का आंदोलन कह कर चुप हो गये। यही हाल कुछ हद तक पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का भी रहा। वे भी छायावाद को ठीक-ठीक अर्थ में नहीं समझ सके।

यहाँ ध्यानाकर्षित करने वाली एक प्रश्न बारंबार मेरे मस्तिष्क में उठ रहा है कि, छायावाद को लेकर जब गंभीर आलोचकों ने अपने हाथ खड़े कर दिये तब सामान्य पाठक वर्ग के लोगों की क्या हालत होती होगी ? जाहिर है वे सब अपने आप को बहुत बड़ी कश्मकश के बीच पाते होंगे। इससे यही प्रतीत होता है कि, साधारण पाठक वर्ग को छायावादी काव्य में निहित लाक्षणिक अर्थ को समझने में अत्यंत कठिनाईयों का सामना करना पड़ा होगा। ऐसे परिवेश में आचार्य नंददुलारे वाजपेयी जी का कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि पहली बार उन्होंने बड़ी दृढ़ता के साथ छायावाद के दृष्टिकोण को, रचना शीलता को तत्कालीन परिवेश के साथ जोड़कर देखने का प्रयास किया। नवीन सामाजिक चेतना की प्रधानता, राष्ट्रीय चेतना पर बल, मानवतावादी जीवन दर्शन तथा नवीन सौंदर्य-बोध जैसे छायावाद की मूलभूत विशेषताओं को उन्होंने न केवल उद्घाटित किया बल्कि उस पर नये सिरे से विचार-विमर्श करने की परंपरा का सूत्रपात भी किया।

छायावादी आलोचना के मैदान पर आचार्य नंददुलारे वाजपेयी जी के आने से एक कार्य बहुत अच्छा हुआ कि, छायावाद से जुड़ी पूर्ववर्ती कुछ आलोचकों द्वारा प्रतिपादित भ्रांत धारणाएँ टूटने लगी। जैसे- छायावादी रहस्यवाद में मध्ययुगीन संतों की छाया है। छायावादी प्रेमकाव्य रीतिकालीन काव्य धारा का नया पुनरावर्तन है, आदि-आदि।

वाजपेयी जी ने दोनों युगों का अंतर काफी हद तक स्पष्ट किया है। कुछ हद तक उन्होंने भी छायावाद की व्याख्या आध्यात्मिकता के रूप में की है। लेकिन उनकी आध्यात्मिकता शुक्लजी के आध्यात्मिकता से केवल इस अंतर के साथ है कि उसमें धार्मिक स्थूलता नहीं है। बावजूद इसके वाजपेयी जी ने यह साफ-साफ कहा कि, छायावाद का आरंभ मध्यकालीन रीतिकाव्य के अत्यधिक विरोध में हुआ, जिसका अपना जीवन दर्शन है। इस मत का खण्डन आगे चलकर नामवर सिंह करते हैं। छायावाद को वाजपेयी जी जहाँ मध्यकालीन परंपराओं का प्रतिक्रिया के रूप में स्वीकार करते हैं वहीं नामवर जी उसे प्रवाहमान परंपरा से जोड़कर देखने के पक्षपाती हैं। दूसरी तरफ डॉ. नगेंद्र जी का मत छायावाद के संदर्भ में काफी हद तक वाजपेयी जी के साथ मेल खाता है। वह भी छायावाद को पूर्ववर्ती कविताओं की प्रतिक्रिया मानते हैं। परंतु छायावाद के संबंध में एक मोड़ ऐसा भी आता है जहाँ स्वयं वाजपेयी जी भी स्पष्ट नहीं दिखायी देते और उसी अस्पष्टता को इंगित करते हुए रामदरश मिश्र लिखते हैं-

“वाजपेयी जी ने छायावाद की व्यक्तिगत चेतना का सामाजिक विश्लेषण नहीं किया। राष्ट्रीय चेतना की बातें तो बहुत की (यद्यपि वह छायावाद में कैसे मुखर हुई, इसका स्पष्ट निर्देश नहीं कर सके) किंतु नवीन पूंजीवादी व्यवस्था की पृष्ठभूमि पर जो नयी चेतना फूटी (जिसे व्यक्तिवादी चेतना कहा गया) उसे वाजपेयी जी नहीं देख सके।”1

हो सकता है कि, रामदरश मिश्र जिस व्यक्तिवादी चेतना की बात कर रहे हैं उसकी सटीक व्याख्या वाजपेयी जी ने न की हो पर यह बात निर्विवाद है कि, छायावाद के स्वरूप को समझने के लिये वाजपेयी जी के निबंध बड़े कारगर सिद्ध होते हैं। जहाँ तक व्यक्तिवादी चेतना की बात है उस पर हजारी प्रसाद द्विवेदी, शिवदान सिंह चौहान तथा बाद के अन्य विचारकों ने पर्याप्त कार्य किया है।

हिंदी-साहित्य में छायावाद अपने आप में इतनी सारी विविधताओं को लिये खड़ा है कि, उसके मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन के संबंध में कुछ भी कह पाना कठिन हो जाता है। क्योंकि छायावाद के स्वरूप को स्पष्ट करने वाले आलोचकों में स्वंय छायावादी कवि आलोचक भी थे। जिसके कारण छायावादी संबंधी मान्यताएँ अथवा धारणाएँ और भी गूढ़ हो जाती हैं। जब छायावाद और मुक्तिबोध एक साथ ऊभर कर आते हैं। कहने का आशय यह है कि हिंदी-साहित्य में छायावाद और मुक्तिबोध की चर्चा कभी एक साथ नहीं हुई। अपवाद के रूप में कहीं छीट-पुट रूप से हुई, व्यापकता की दृष्टि से न के बराबर है। क्योंकि छायावाद और मुक्तिबोध दोनों दो अलग-अलग विशेषताओं के लिये जाने जाते हैं। छायावाद के कल्पना मात्र से जहाँ प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी वर्मा का नाम स्मरण होता है तो वहीं मुक्तिबोध के नाम से ही तार सप्तक, ब्रह्मराक्षस तथा अंधेरे में जैसी लंबी कविताओं की याद आती है। मुक्तिबोध की चर्चा हमेशा प्रगतिशील और नयी कविता के बीच की कड़ी के रूप में ही होती है। इसलिए दोनों के मध्य तालमेल बिठाने का कार्य बहुत अटपटा सा प्रतीत होता है। बावजूद इसके इन दोनों में निहित अंर्तसंबंध को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

मुक्तिबोध को अगर ध्यान से पढ़ा जाये तो यह तथ्य सामने आता है कि, उनकी प्रारंभिक कविताओं की समय सीमा सन् 1935 ई. के आस-पास शुरू होता है, जो छायावाद का उत्कर्ष काल माना जाता है। जाहिर है एक महत्वपूर्ण कवि होने के नाते उनकी शुरूआती कविताओं में अपने पूर्ववर्तियों की छाया प्रतिफलित हुई होगी। क्योंकि तार्किकता हमें यही सिखाती है कि कोई भी चीज अचानक प्रारंभ नहीं होता। कमो-वेश उसकी अपनी इतिहास होती है जिस पर चल कर वह अपने मौजूदा समय में पहुँचती है। इस नाते हम मुक्तिबोध के प्रारंभिक कविताओं को छायावाद की उपज मान सकते हैं। स्वंय ‘मुक्तिबोध रचनावली’ के संपादक नैमिचंद जैन भी यही मानते हैं। जिसके संबंध में उनकी टिप्पणी कुछ इस प्रकार है –

“मुक्तिबोध के उस दौर (1935 – 39 में लिखी हुई प्रारंभिक कविताएँ ) की कविताओं पर माखनलाल चतुर्वेदी की शैली और संवेदना की छाप स्पष्ट दिखायी पड़ती है।”2

उपर्युक्त कथन को मुक्तिबोध ने अपने आत्मवक्तव्य में कुछ इस प्रकार कहा है-

“इंदौर में प्रथमत: मुझे अनुभव हुआ कि यह सौंदर्य ही मेरे काव्य का विषय हो सकता है। इसके पहले उज्जैन में स्वर्गीय रमाशंकर शुक्ल की कविताएँ – जो माखनलाल स्कूल की निकली हुई शाखा थी – मुझे प्रभावित करती रहीं, … मित्र कहते हैं, कि उनका प्रभाव मुझ पर से अब तक नहीं गया है। इंदौर में मित्रों के सहयोग और सहायता से मैं अपने आंतरिक क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ और पुरानी उलझन भरी अभिव्यक्ति और अमूर्त्त करूणा छोड़ कर नवीन सौंदर्य – क्षेत्र के प्रति जागरूक हुआ। यह मेरी प्रथम आत्म चेतना थी।”3

अर्थात् मुक्तिबोध यह कहना चाहते हैं कि उन पर छायावादी स्कूल का प्रभाव रहा, जिससे मुक्त होकर वे अपने आंतरिक क्षेत्र यानि अपने निजस्व में प्रविष्ट हुए एवं पुरानी उलझन भरी अभिव्यक्ति और अमूर्त्त करूणा जिसका तात्पर्य छायावाद शैली से है, उसे त्याग कर नवीन सौंदर्य क्षेत्र की ओर अग्रसर हुए। उपर्युक्त कथन से यह स्पष्ट होता है कि उनकी प्रारंभिक कविताओं में छायावादी शैली की छाया विद्यमान थी। उदाहरण के तौर पर उनकी ‘तू और मैं’ कविता द्रष्टव्य है-

 “मैं बना उन्माद री सखि, तु तरल अवसाद
 प्रेम-पारावार पीड़ा, तु सुनहली याद 
 तैल तू तो दीप मैं हूँ, सजग मेरे प्राण !”4 

          मुक्तिबोध एक कवि होने के साथ-साथ एक गंभीर आलोचक भी हैं। इसलिए छायावाद के पुनर्मूल्यांकन में ‘कामायनी : एक पुनर्विचार’ पुस्तक की चर्चा अनिवार्य है। क्योंकि ‘कामायनी: एक पुनर्विचार’ में कामायनी के प्रति मुक्तिबोध का दृष्टिकोण अपने समसामायिक आलोचकों से काफी अलग रहा है। पहली बार मुक्तिबोध ने कामायनी को एक विशाल फैंटेसी के रूप में देखने का प्रयास किया है, वह भी तार्किकता के साथ। यहाँ मुक्तिबोध फैंटेसी के माध्यम से अपने समसामायिक समस्याओं का चित्रण बिलकुल नये सिरे से करते हुए नजर आते हैं। जिसका प्रमाण नीचे दिये गये उदाहरण से साफ-साफ पता चलता है। वे लिखते हैं-

“पिछले बीस वर्षों से मैं कामायनी का पठन-पाठन और अध्ययन करता आया हूँ। मुझे बार-बार लगा कि प्रसाद जी फैंटेसी द्वारा, जीवन ज्ञान, इच्छित विश्वास और अपनी मूल्य-भावनाओं के अतिरिक्त, एक जीवन समस्या प्रकट कर रहे हैं – ऐसी जीवन – समस्या जो प्रसाद के आभ्यंतर लोक में छ्टपटाती रही है, ऐसी वह कि जो उनकी अपनी है, और जिस पर वे चिरकाल से मनन और चिंतन करते आये हैं, उन्हें वैसा करना पड़ा है। … क्योंकि कामायनी वस्तुत: एक आत्मपरक काव्य है, उसमें गहन – गूढ़ भावनाएँ प्रतिबिम्बित हुई हैं। उस समस्या को प्रसाद जी के व्यक्तित्व से मिला कर देखने से, और उस व्यक्तित्व को उसके अपने दिक्काल से मिलाकर देखने से ही, कामायनी का अध्ययन हो सकता है, होना चाहिए।”5   

यह बात कितनी चौकाने वाली है कि, मुक्तिबोध ने अपने छोटे से जीवन काल में (1917जन्म-1964मृत्यु) जो सिर्फ 47 वर्ष की थी, उसमें से 20 वर्ष केवल कामायनी के अध्ययन में ही बिता देते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मुक्तिबोध अपने कार्य के प्रति बहुत सजग और ईमानदार थे और इसी ईमानदारी के पथ पर चलते हुए उन्होंने अपनी साहित्यिक रचनाओं की सर्जना की। मुक्तिबोध के कथनी और करनी में जो सामंजस्य भाव निखर कर आता है, वह इसी ईमानदारी की देन है। ‘कामायनी : एक पुनर्विचार’ मुक्तिबोध की इसी ईमानदारी आलोचना का लेखा-जोखा है जिसके संबंध में वे स्वंय लिखते हैं-

“कामायनी का अध्ययन और उसके मूल सूत्रों का आकलन तब तक नहीं हो सकता जब तक कि हम मानव-जीवन को उसके समस्त परिवेश और परिस्थिति से, आवयविक रुप से संबंधित करके न देख सकें। कामायनी की केवल मनोवैज्ञानिक व्याख्या अपर्याप्त है, असंगत भी। आलोचक का यह धर्म है कि वह कामायनी में उपस्थित जीवन सामस्या की, उस आवयविक रूप से संलग्न परिवेश-परिस्थिति की, तथा इन दोनों के संबंध में कवि दृष्टि की, तथा उस जीवन समस्या के कवि-कृत निदान की, समीक्षा करे। मैंने वैसा करने का प्रयत्न किया है।”6  

मुक्तिबोध अपनी दूर-दृष्टि के कारण कामायनी की जो चर्चा करते हैं वह बेहद दिलचस्प है। मुक्तिबोध कामायनी को छायावादी काव्य से एक कदम आगे की काव्य मानते हैं। जिसके अंतर्गत पूंजीवादी व्यवस्था, व्यक्तिवाद की समस्या, सामंतवाद की तानाशाही तथा साम्राज्यवाद के तमाम कठिनाईयों का जिक्र है। साथ ही साथ कामायनी को उसकी ऐतिहासिकता से अलगाते हुए अपने समय संदर्भ के साथ जोड़ा है। ‘मनु’ को नये कसौटी पर कसने का महत्वपूर्ण कार्य भी किया है। मुक्तिबोध के ‘मनु’ संबंधी विचार प्रसाद के ‘मनु’ से काफी अलग है, जिसके संबंध में उनकी राय कुछ इस प्रकार है-

“मानव चरित्र का शायद ही कोई दुर्गुण हो जो मनु के चरित्र में न मिलता हो। अहंकार, विलासिता, आत्ममोह, निर्बंध उच्छृंखलता, निविड़ आत्म्विश्लेषण जो पराजय से प्रसूत होकर पराजयों की ओर ले जाता है, मनु की विशेषता है।”7 वहीं आगे मुक्तिबोध कहते हैं- “मनु उनके वर्ग का, उस वर्ग के स्वंय प्रसाद जी की अपनी कमजोरियों का तथा व्यक्तिवाद-पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का (भारतीय पैमाने पर, भारतीय भूमि में) वर्ग प्रतिनिधि बना।”8

मुक्तिबोध का उद्देश्य यहाँ मनु के माध्यम से आधुनिक भारतीय समाज व्यवस्था में व्याप्त उन तमाम समस्याओं और विकृतियों का समाधान ढ़ूँढना था जिसकी ओर दूसरे आलोचकों की नजर नहीं गयी थी। इसके अतिरिक्त इड़ा और श्रद्धा के चारित्रिक विश्लेषण द्वारा उन्होंने जिस वर्ग-संघर्ष की ओर इशारा किया है वह अपने आप में एक साहसिक कार्य है। मुक्तिबोध ने कामायनी के पुनर्मूल्यांकन का जो प्रयास किया है, उससे मूल रचना की यथार्थता और विचारधारा को एक नई पहचान मिली है। छायावाद को ठीक-ठीक परिभाषित करने के प्रयास में मुक्तिबोध की राय प्रसाद के बाद सुमित्रानंदन पंत के ऊपर क्या रही है उसे जानने की ललक हमें मुक्तिबोध के आलोचनात्मक कर्म की ओर करीब ले जाती है। पंत के संबंध मे मुक्तिबोध की राय कुछ इस प्रकार है-

“यद्यपि पंत जी आज हिंदी के ज्येष्ठतम कवियों में से हैं, मुझे प्रतीत होता है कि वे अभी तरुण हैं।”9

मुक्तिबोध का पंत जी को तरुण कवि कहना यह उनकी कविताओं पर प्रश्न चिह्न लगाने जैसा है। तभी तो वह इस प्रकार की उक्ति का प्रयोग करते हैं कि,

“काव्य में थीसिस लिखना अथवा थीसिस रूप में काव्य लिखना पंतजी के बस की बात नहीं है।”10

कहीं न कहीं मुक्तिबोध की यह टिप्पणी उनकी पैनी आलोचनात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है। जहाँ वे अपने मत स्वाधीनता से देते हैं।

अंतत:  निष्कर्ष के रूप में यही कहा जा सकता है कि मुक्तिबोध का छायावाद के प्रति बहुत गहरा और व्यापक लगाव रहा है। जिसका प्रमाण उनकी आलोचना और रचना दोनों में आसानी से मिल जाता है। जरूरत बस इतनी सी है कि, उनकी प्रारंभिक कविताओं की चर्चा उसी तर्ज पर हो जैसी उनकी लंबी कविताओं की होती है। रही बात छायावाद के पुनर्मूल्यांकन की तो उसमें मुक्तिबोध का योगदान यह है कि, उन्होंने छायावादी काव्य आंदोलन को व्यापक क्रांति का नाम दिया है।

— ऐश्वर्या पात्र

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  1. Manju Singh May 14, 2017 at 6:13 pm

    sach hai , sadharann pathak ke palle kum hi padti hain chhayavadi kaviyon ki rachnayen ……visheshkar Mahadevi ji ki !!!

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