बिखरा हुआ मन

बिखरा हुआ मन

By | 2017-05-12T09:01:34+00:00 May 11th, 2017|Categories: कविता|Tags: |0 Comments

बिखरा हुआ मन
सिमटा हुआ तन
कही मै भयभीत तो नही
पर भय किसका
ओ हा जमाने के ठेकेदारों का
ये ठेकेदार बरसाती मेढक
की तरह निकलते है
आपके सुख में न जाने कहा
गायब हो जाते है
दुःख की बारिश में हजार
आ जाते है
शब्दो से टर्र टर्र करते
ह्रदय को छलनी कर जाते है
तो क्या मैं सिमटा रहू
जिंदगी भर
फिर मुझमे और नवजात
परिंदे में अंतर क्या
जो अपने पंख को समेटे
कही किसी घोसले
में बैठा है
अब वक्त है पंख फ़ैलाने का
खुले आसमान में साँस लेकर
अपनी आजादी को महसूस करने का
मैं अब उड़ूँगा पंख पसार
इस अंतरिक्ष में
मुझे इन मेढकों की टर्र टर्र
सुनाई नही देगी
बस मैं और मेरी आजादी

— अर्जित पाण्डेय

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