एक ताजमहल स्मृतियों का

एक ताजमहल स्मृतियों का

By | 2017-05-17T08:07:37+00:00 May 16th, 2017|Categories: दोहे|0 Comments

 मधुशाला छन्द में 

समेटकर नयी पुरानी
नन्ही नन्हीं ख्वाहिशें,
कोमल अनछुए भाव
पाक मासूम एहसास,
कपट के चुभते काँटे
विश्वास के चंद चिथड़़े,
अवहेलना के अगूंज
बेरूखी से रूखे लफ्ज़,
और कुछ रेशमी सतरंगी
तितलियों से उड़ते ख्वाब,
बार बार मन के फूलों
पर बैठने को आतुर,
कोमल नाजुक खुशबू में
लिपटे हसीन लम्हे,
जिसे छूकर महकती है
दिल की बेरंग दिवारे,
जो कुछ भी मिला है
तुम्हारे साथ बिताये,
उन पलों को बाँधकर
वक्त की चादर में लपेट
नम पलकों से छूकर,
दफन कर दिया है
पत्थर के पिटारों में,
और मन के कोरे पन्नों
पर लिखी इबारत को
सजा दिया है भावहीन
खामोश संगमरमर के
स्पंदनविहीन महलों में,
जिसके खाली दीवारों पर
चीखती है उदासियाँ,
चाँदनी रातों में चाँद की
परछाईयों में बिसूरते है
सिसकते हुए जज्बात,
कुछ मौन संवेदनाएँ है
जिसमें तुम होकर भी
कहीं नहीं हो सकते हो,
खामोश वक्त ने बदल दिया
सारी यादों को मज़ार में,
बस कुछ फूल है इबादत के
नम दुआओं में पिरोये
जो हर दिन चढ़ाना नहीं भूलती
स्मृतियों के उस ताजमहल में।

–श्वेता

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