कोई नहीं मसीहा तुम्हारा

कोई नहीं मसीहा तुम्हारा

By | 2017-05-24T00:56:19+00:00 May 24th, 2017|Categories: सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे|0 Comments

कोई नहीं मसीहा तुम्हारा , न कोई है रक्षक ,

सारा जहाँ बना है दुश्मन, हर कोई है भक्षक |

गली -गली और नुक्कड़ -नुक्कड़ होतीं तुम अपमानित ,

कहते देवी पर लगती हो सदियों से तुम शापित |

मेरा कहा जो मानो तो अब भारत की महिलाओं

अपनी रक्षा की खातिर तुम खुद ही शस्त्र उठाओ  |

शस्त्र तुम्हारे नहीं दुनाली, तीर न ही शमशीर,

सीख कराटे , कुंफू ,कुश्ती बनो तुम भी अब वीर |

अबला नहीं बनो अब सबला दिखला दो दुनिया को ,

ज़ुल्मत नहीं सहेंगे यह मंज़ूर नहीं अब हमको |

दिखला देंगे सबको अब हम एक नयी तस्वीर ,

खुद लिखेंगे हिम्मत करके , हम अपनी तक़दीर |

मंजू सिंह

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About the Author:

बीस वर्षों तक हिन्दी अध्यापन किया । अध्यापन के साथ शौकिया तौर पर थोडा बहुत लेखन कार्य भी करती रही । उझे सामजिक और पारिवारिक इश्यों पर कविता कहानी लेख आदि लिखना बेहद पसन्द है।

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