झोंपड़ी के द्वार पर दीपक नहीं तो

झोंपड़ी के द्वार पर दीपक नहीं तो

By | 2017-05-27T23:40:00+00:00 May 27th, 2017|Categories: कविता|3 Comments

झोंपड़ी के द्वार पर दीपक नहीं तो
आसमाँ पर चाँद रहकर क्या करेगा?
भूख घर में रो रही है,
जिगर का टुकड़ा समेटे गोद में
ढो रही है यह गरीबी
जिंदगी का भार,
ऐ करतार! क्या स्वीकार?
तुमको दर्द का संसार
तार तन पर भार यौवन
लाज खुद में सिमटती है,
आजकल देखती है
विश्व-मठ में
आज जाने यह कर्ता
कल क्या करेगा?
आसमाँ पर चाँद रहकर क्या करेगा?
आबरू पर लाख पैबंद लग रहे हैं
जी रही है यह गरीबी
मौत की गरिमा सँभाले,
जल रही है वर्तिका बन वेदना की
इसलिए कि दीपमाला तुम सजा लो
महल तेरा शहर का शृंगार

उसकी झोंपड़ी भी भार
धत् धिक्कार
यह उत्सर्ग की है हार,
कल ही देख लेना
जब प्रलय की आग में
तेरी कला जलकर राख होगी,
और तू असहाय होगा
बोल तब तू हाथ मलकर क्या करेगा?
झोंपड़ी के द्वार पर दीपक नहीं तो
आसमाँ पर चाँद रहकर क्या करेगा?
महल में इंसान क्या भगवान?
लेकर पाप का सामान
बोतलों में बंद कर काली कमाई
बेहयाई वासना की चूसता है रात में
और दिन में
गरीबों की धमनियों से गरम शोणित
रोटियों की भूख का
शव भूनता है,
नोचता है/गोस्त की नमकीन बोटी
लोग कहते स्वर्ग कोठा बन चुका है,
मूर्खता है/लोग कहते
शक्ति संचित महल में है/मूर्खता है
झोंपड़ी के द्वार पर दीपक नहीं तो
आसमाँ पर चाँद रहकर क्या करेगा?

— छेदी साह

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  1. Kamal May 28, 2017 at 12:36 pm

    Bahut bahut Badhai…

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  2. Kamal May 30, 2017 at 5:44 am

    बहुत लाभप्रद रचना

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  3. Dr. Chhedi sah May 31, 2017 at 7:18 am

    आज के दौर में ऎसी कविता बहुत कम पढ़ने को मिलता है लेखक को बहुत बहुत धन्यवाद।

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