माँ

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माँ

By | 2017-06-09T22:28:22+00:00 June 9th, 2017|Categories: कविता|0 Comments

बिस्तर पर लेटे लेटे,
गोद में खेलते खेलते,
जाने कब घुटनों पे रेंगने लगा मैं,
माँ, तेरी ममता की छांव में,
सुबह सुबह जगाना तेरा,
नाश्ता कराना तेरा,
स्कूल से थका हारा आऊं,
सिर पर हाथ फिराना तेरा,
कब लेटे लेटे सो जाता मैं,
माँ, तेरी ममता की छांव में,
मेरा रूठना और तेरा मनाना,
पेपर से पहले मुझे गुड़ खिलाना,
आज भी सब कुछ वैसा होता, माँ.
धन दौलत इज्जत मान मर्यादा,
सब लुट गया मेरा ,
जब से साथ छुट गया मेरा,
माँ, तुझसे.
वक़्त के लहरों में खो ग़ई कश्ती मेरी,
जब माँ ने अनंत नीद ली.
घर बार सब बुरे लगने लगे हैं ,
यहाँ तक प्यार से भी डरने लगे हैं,
जब से माँ के जनाजे को कंधा लगाए हैं.

– विकास तिवारी

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