पेड़ पौधे और हमारा बचपन

पेड़ पौधे और हमारा बचपन

By | 2017-06-18T00:22:06+00:00 June 18th, 2017|Categories: संस्मरण|0 Comments

आज से 10-12साल पहले हमारे और पड़ोसी गांवों में आम, महुआ, जामुन, बाँस, कटहल, शीशम, और सहिजन के पेड़ बहुतायत में देखना कैसे मनोरम दृश्य थे ? एक से बड़े एक बागीचे जिन्हें हम अपनी भोजपुरी में बारी कहते थे. आज न तो बागीचे रह गए हैं और न ही पेड़. चारों ओर केवल गड्ढे और बबूल आदि कटिले झँगाठ फ़ैले मील रहे हैं. अप्रैल, मई, जून, और जुलाई में अत्याधिक गर्मी में वे बारी बागीचे पशु, पक्षी और राहगीरों के साथ हम बच्चों के मनोरंजक स्थल थे और हम खा – पी कर बाबा के साथ बागीचे की ओर हो लेते थे. लेकिन वक़्त इस कदर बदला कि आज सुबह आठ बजे के बाद और शाम छः सात से पहले निकलने में नानी दादी याद आने लगी हैं. नहीं तो उस वक़्त मौसम चाहे गर्म हो या गरज बरस का बारी की ओर दौड़ लग ही जाती थी. न हमें धुप लगती न बौछार से भीगने से सर्दी लगती. चलती लू भी डरा नहीं पाता था. गर्मी के चार महीने हम सबको सबसे ज्यादा भाते थे क्योंकि हमे स्कूल जैसे कैदखानो से निजात मील जाती थी और आम – जामुन और कटहल खाने, खेलने और गाय चराने का समय मिलता था. दो तीन महीने गाय चराने का आनंद ही स्वर्णिम था. पेड़ कट जाने से कई प्रकार के लोकल खेल जैसे ओल्हा-पाति मृत प्राय हो गए . बंदरों का पेड़ों की टहनियों का हिलाना और गिरे आम को बीनने का एक अलग मजा था. जो आज के बच्चों को कहाँ नसीब? आज के बच्चे आर्टिफ़िशियल पार्क में जाते हैं और अशोक और यूकेलिप्टस को देख 🌱 का आनंद उठाते हैं.
बारी में हम लोग घर से सत्तू और आचार के मशाले ले के जाते और बीने हुए या पेड़ पर चढ़ कर तोड़े आम का पन्ना बना कर सामुहिक पीने का सौन्दर्य ही कुछ अलग था. जो आज आम खरीद के बनाए पन्ना में कहाँ, वो नोक झोक, नाप तौल उसी कब्र ( गड्ढे ) में पड़ गये जहाँ से पेड़ों के जड़ खोद के निकाले गए हैं. साथ ही उस जुनून का भी कत्ल हो गया जो बादल उठते ही बोरी ले के बारी की ओर भागने का था. गड्ढे गूचे में गिरे आम बरसात में भी खोज निकालने का ग़ुरूर हमारी आंखों के सामने चूर चूर होते रहे और हम निःशब्द देखते रहे. हमसे बड़ा स्वार्थीपन और कृतघ्नता प्रकृति प्रदत्त किसी प्राणी में नहीं. केवल हम ही हैं इस धरा पर जिसने अपने भोग के लिए आनंद को खून के आंसू रुलाते हैं. हमारे बाप दादा के पास कथाएं थी हमें सुनाने के लिए तो दिखाने के लिए पेड़ पौधे और बारी बागीचे भी थे लेकिन हमारे पास अपनी आने वाली पीढ़ी को न तो सुनाने के लिए कथाएं होंगी और न दिखाने के लिए पेड़ पौधे और बारी बागीचे.

– विकास तिवारी

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