संवाद…

संवाद…

By | 2017-06-21T00:52:22+00:00 June 21st, 2017|Categories: कविता|0 Comments

अपनों से अपने लिए …

तू है दुखी पता मुझको भी चल रहा है ,
पर मेरे बस में कहाँ ये सब जो चल रहा है |
मैं परेशां तू भी परेशान ऐसा ही हाल है आजकल ,
ऐ वक़्त बदल दे ये दिन बहुत हो गया अब वाक़ई खल रहा है |
समझो तो बस में नहीं सबकुछ मेरे पर प्रयास जारी है ,
एक रोज वक़्त बदलेगा वक़्त झूठी ही सही आस जारी है |
मुझे पता है दिन कट रहे हैं लोग बढ़ रहे है सूरज ढल रहा है ,
पर मेरे बस में कहाँ ये सब जो चल रहा है |
तू है दुखी पता मुझको भी चल रहा है ,
पर मेरे बस में कहाँ ये सब जो चल रहा है |
— आकाश पाण्डेय

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