जीवन की साँझ

जीवन की साँझ

By | 2017-06-21T00:44:46+00:00 June 21st, 2017|Categories: कहानी|Tags: |0 Comments

चाँद सी महबूबा हो मेरी….ऐसा मैंने सोचा था हाँ तुम बिलकुल वैसी हो जैसे मैंने सोचा था….का सुमधुर शुक्ला जी का मनपसंद गाना बज रहा था।तभी शुक्ला जी मेरे नजदीक आकर इस गाने को गुनगुनाने लगते है।मैं उनसे कहती हूँ,अब तो आप रिटायर हो गए हो इस बुढ़ापे में इतना रोमांस भला अच्छा लगता है क्या? तो उनका वही पुराना डायलॉग सुगंधा हम दोनों का प्यार हमारे दिल में है और प्रेम कभी बूढ़ा नही होता और फिर शुक्ला जी और मैं एक दूसरे को देखकर आँखों ही आँखों में मुस्कुरा पड़ते है।
बेंगलोर में ही तो हम लोग रहते है जंहा हमारा बंगला है।जँहा शान्तनु का बचपन और उसकी इजीनियरिंग की पूरी पढ़ाई हुई है हमने शान्तनु को बहुत अच्छे संस्कार दिए जो हर एक माता पिता देने का प्रयास करते है।शान्तनु भी हमे उतना ही प्यार और आदर देता है।बहुत ही होनहार है शान्तनु इंटरमीडिएट से लेकर कालेज तक हर परिक्षा में मेरिट में आया है आज शान्तनु न्यूयार्क में मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर है।शान्तनु ने शादी भी हमारी पसंद की इंजीनियर लड़की से की है।
शान्तनु तो विदेश में नोकरी करना चाहता ही नही था,परन्तु शुक्ला जी ने बेहतर भविष्य के लिए बेटा और बहु को न्यूयार्क जाने को मना ही लिया।आज भी 5वर्षो में कोई संडे नही होता जब शान्तनु और अर्पणा का फोन ना आता हो।और एक बात तो बताना भूल ही गयी।हर दीपावली में शान्तनु और अर्पणा महीने भर के लिए आते है बहुत खुशियों भरे दिन होते है।शान्तनु तो बच्चा ही बन जाता है”मम्मी मेरे सर पे मालिश कर दो”
मम्मी मेरे लिए आलू के पराठे बनाओ” बिल्कुल बच्चे की तरह रहता है।
शान्तनु के लिए तो शुक्ला जी तो आदर्श है उनकी हर एक बात उसके लिए मानो पत्थर की लकीर होती है।बहु भी बहुत समझदार है।शान्तनु और अर्पणा के बीच बहुत् प्यार है।और बहु को भी अपने घर में अच्छे संस्कार मिले है।यूँ ही एक महीना दीपावली का बीत जाता है और पता ही नही चलता।
एयरपोर्ट पर मैं कभी छोड़ने नही जाती पर घर से बाहर निकलते समय मेरी ,शान्तनु और अर्पणा की आँखे नम हो जाया करती है और अर्पणा भी हमेशा कहती हैं माँ पापा आप भी न्यूयार्क क्यों नही रहते हमारे साथ।
यूँ ही पांच वर्ष बीत गए।मैं अब 65 की और शुक्ला जी 70 के हो गए है।और थोड़ी थोड़ी बुढ़ापे के लक्षण आने लगे है।मुझे डायबिटीज और इनको आर्थराइटिस है पर अब भी हम सब बहुत खुश है।
हम पति पत्नि बेंगलोर में अपने बंगले में खुश है।रेडियो पर उनका वही पुराना गाना चाँद सी महबूबा……बज रहा है| शाम के 7 बज गए है रसोई की खिड़की से पूर्णिमा की चाँद की रजत किरणे बंगले में लगे हुए पेड़ो को चीरते हुए आ रही है।मैं शुक्ला जी के लिए कॉफ़ी लेकर आती हूँ।वो आराम कुर्सी में झूलते हुए गाना गुनगुना रहे है।तभी मेरे मोबाइल में न्यूयार्क से अर्पणा का फोन आता है।और मुझे प्रणाम कहते हुए बताती है की शान्तनु को मल्टीनेशनल कंपनी द्वारा बेहतर कार्य के उपहार स्वरूप निजी फ़्लैट मिला है।जिसके गृहप्रवेश में हमे आशीर्वाद देने आना ही है।बहु भी बहुत जिद की और उधर से बीच बीच में शान्तनु भी फ़ोन लेकर हम दोनों को बुलाने की जिद करने लगता है,और हम दोनों वंहा जाने को सहमति दे देते है।पासपोर्ट और वीजा का काम तो शान्तनु ने पहले ही करा लिया था।
हम दोनों न्यूयार्क पहुँच जाते है।शान्तनु हमे एयरपोर्ट में ही मिल जाता है।टेक्सी से हम सब घर पहुँच जाते है।न्यूयार्क बहुत बढ़ा शहर है।शुक्ला जी के चेहरे पर थोड़ी घबराहट है इस अजनबी शहर को लेकर जँहा की भाषा,खानपान सब कुछ अलग है। शान्तनु तो अपनी कंपनी में काम से USA में बहुत से शहरों में घूमता रहता है।पर बहु की जॉब न्यूयार्क में ही है।अतः घर की देखभाल वो कर लेती है।शान्तनु ने गृहप्रवेश में अच्छी पार्टी दी।सब से मिलवाया।अच्छा खाना पीना रखा था।
हमारे लिए सारे चेहरे अजनबी थे।15 दिन का वीजा था पर शान्तनु को हमको घुमाने फिराने के लिए 5 दिन की ही छुट्टी  मुश्किल से मिल पाई थी इन 5 दिन में शान्तनु और अर्पणा ने हमे तो ऐसा लगता है जन्नत की ही सैर करा दी।शान्तनु की छुट्टी खत्म हो गयी पर हमारी वापसी में अभी 10 दिन बचे हुए थे।शान्तनु अपने काम में चला गया।पर बहु को 10 दिन छुट्टी लेकर हमारे पास रहने को कह गया था।
अर्पणा को घर का काम करने की आदत थोड़ी कम हो गयी थी,इसलिए वो लंच डिनर बाहर से ये सोचकर मंगा लिया करती थी की मम्मी को काम न करना पड़े पर डायबिटीज़ होने के कारण मेरा शुगर ,bp दोनों धीरे धीरे बढ़ने लगा जिसे मैं सफर और घूमने फिरने की थकान समझने लगी।शुक्ला जी कहते रहे डॉक्टर को दिखा लेते है पर मैं नए शहर में इन्हें परेशान नही करना चाहती थी।फिर एक दिन अचानक मैं बेहोश हो गई।मेरे हाथ पांव सुन्न हो गए तुरन्त मुझे ICU ले जाया गया। शान्तनु भी हॉस्पिटल पँहुच गया।डॉक्टरो ने दो दिन ICU में रखने के बाद मुझे पैरालिसिस बताया शान्तनु ने परिस्तिथि देखकर हमारा वीजा बढ़वा लिया।जब मुझे होश आया तो मानो पहाड़ ही टूट गया मुझ पर मैं सिर्फ सुन और देख सकती थी बाकी हिलना,डुलना,बोलना सब कुछ बंद हो गया था।मेरी तकलीफ से अधिक तकलीफ तो मुझे शुक्ला जी के लगातार बहते हुए आँसु से हो रहा था जो हमेशा गुनगुनाया करते थे उनकी आँखों के आँसू
का हर एक बूँद जो मेरी हथेली पर गिर रहा था मानो मुझे ऐसा लग रहा था की मुझ पर तेज़ाब की बुँदे गिर रही थी।
शुक्ला जी की बढ़ी हुई दाढ़ी वही पाँच दिन से पहने हुए कपड़े बहते हुए उनके आँख के आँसु मुझे बहुत तकलीफ पंहुचा रहे थे।
आज मुझे हॉस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया।और कम से कम एक माह आराम करने को कहा गया। शान्तनु भी बहुत बेचैन था।पर अर्पणा को मैने झुंझलाते हुए देखा,जब शान्तनु ने उसे छुट्टी लेने को कहा।खैर हम सब घर आ गए।न्ययॉर्क के छोटे से फ़्लैट में।शुक्ला जी की आंसुओं में मेने अपने एक एक तकलीफ को महसूस किया।वाकई में उम्र के इस पढ़ाव में ऐसे लगता है जैसे हम दोनों की साँसे और दिल साथ ही धङकता है।
शान्तनु अपने काम में चला गया।इन दिनों अर्पणा का व्यवहार मैंने रूखा होते हुए देखा।शान्तनु को लगता था की अर्पणा मम्मी का ख्याल रखती होगी।पर वो तो हमेशा अपने कमरे में बंद रहती थी।डॉक्टरों ने मुझे बाहर का खाना मना किया हुआ था।पर अर्पणा तो रेस्टोरेंट से ही खाना मंगाने लगी।शुक्ला जी के टोकने पर बहु उनको झिड़क दी।शान्तनु जिसने अपने पापा से नजर मिला के बात तक ना की थी आज उन्हें बहु की डांट पड़ी।ये देखकर सहसा मेरे आँखों से आंसू ढल गए पर उनसे नजर ना मिले मैंने अपनी आँखे बंद कर ली जिससे उन्हें शर्मिंदा ना होना पड़े।शुक्ला जी जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी चाय की एक प्याली ना बनाई।वो इंटरनेट से देख देखकर मेरे लिए बाजार से खुद सामान लेकर मेरे लिये खाना बनाने लगे।शुक्ला जी की ये हालत देखकर मैं बुरी तरह घुटने लगी।मन करने लगा की भगवान् मुझे विदा कर दे।पर इनको मैं इस दुनियां में छोड़ना नही चाहती थी।
शुक्ला जी सचमुच बहुत बदल गए थे जो बहुत टिपटॉप रहते थे।आज बहुत अस्त व्यस्त हो गए है।वो रोज भगवान की पूजा करते,मेरे लिए पानी गर्म  करते,रसोई बनाते।यँहा तक की मेरे कपड़े भी धोने लगे थे।पर जब भी शान्तनु का फोन आता यही  कहते बहु हमारा बहुत ख्याल रखती है तुम अपना काम देखो।यँहा की बिल्कुल चिंता ना करों।
एक दिन शुक्ला जी मेरे लिए दवा लेने मार्केट गए हुए थे।आने में देर हुई रात का कुछ खाना बचा हुआ था अर्पणा ने मुझे खिला दिया।शुक्ला जी किचन गए तो
उन्होंने अर्पणा से पूछा तो अर्पणा का जवाब सुनकर मैं सन्न रह गयी की “पापा जी खाना फेकने से तो अच्छा ये है की मम्मी ने खा लिया।” शुक्ला जी को इतनी ऊँची आवाज में जवाब देते हुए सुन मेरा स्वास्थ्य बिगड़ गया।शुक्ला जी ने तुरन्त डॉक्टर को फ़ोन किया।अर्पणा फिर से अपने कमरे में बंद हो गयी।डॉक्टर के आने पर डोर बेल बजी जिसकी आवाज सुनकर ये सरपट दरवाजे की तरफ बढे और हड़बड़ाहट में दरवाजा के हैंडल से थोड़ी आवाज हुई तो अर्पणा ने ही अंदर से ही आवाज लगाई “पापा जी दरवाजा थोड़ ही दोगे क्या?? और अर्पणा धीरे धीरे बुदबुदाई की इनको तो बुढ़ापे में जवानी छाई है।बुढ़ापे का प्यार”| ये सब सुनकर तो मेरा कलेजा तार तार हो गया।
जिस बेटे के जीवन तराशने के लिए इन्होंने अपनी सुख सुविधा की बलि चढ़ा दी।उन्हें ये सब सुनना पढ़ रहा है।
पता नही अर्पणा ने शान्तनु को क्या बताया की शान्तनु जो हमारा वीजा 1 माह का बढ़वाया था। उसने हमारे लिए एयरएम्बुलेंस की व्यवस्था कर बेंगलोर भेजने को तैयार हो गया।हालांकि इस व्यवस्था के लिए शान्तनु की मैं हमेशा उपकार मानूंगी क्योंकि मैं अपने सामने इन्हें इस तरह जलील होते देखना नही चाहती थी।
इन्होने भी शान्तनु से कोई शिकायत नही की और कहा बेटा तुमने और बहु ने हमारा बहुत् ख्याल रखा ईश्वर तुम्हे सदैव सुखी रखे।
हम अपने उसी आशियाने में फिर लौट आये जँहा हम प्यार से रहते थे।धीरे धीरे मैं भी ठीक होने लगी।रेडियो में अब फिर से शुक्ला जी मनपसंद गीत सुनते है।
जीवन की साँझ अब हम इसी आशियाने में साथ गुजार रहे है।ईश्वर से यही प्रार्थना है की जीवन के इस अंतिम पढ़ाव में जो भी अकेला रह जाए उसके जीवन में कोई भी तकलीफ न रहे।

— शालिनीपंकज दुबे

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