शर्त

शर्त

By | 2017-08-01T16:19:34+00:00 July 19th, 2017|Categories: कहानी|Tags: |0 Comments

आज सुबह से ही घर में सभी परेशान हैं कि इतनी जल्दी सब तैयारी कैसे
होगी, कुछ का इंतजाम नहीं है। कल ही तो सभी वैष् णव देवी के दर्शन करके यात्रा
से थके-मादे लौटे हैं। और लौटते ही माता की कृपा हो गई। घर लौटने के क घ्
ांटे बाद ही फोन की घंटी बजी … ट्रिंग -ट्रिंग……….. हैलो ! जी मैं श्याम बिहारी
जी से बात कर सकता हूँ ? जी हाँ मैं श्याम विहारी ही बोल रहा हूँ। कहि क्या
बात है ? जी, मैं राजेन्द्र प्रसाद बोल रहा हूँ। कानपुर से। पहचाने साहब ! जी-जी
…. कैसी बात करते हैं साहब! भला मैं आपको कैसे भूल सकता हूँ। मु तो आपके
फोन का बेसब्री से इंतजार था। सोच ही रहा था कि इतने दिन हो ग आपसे
मुलाकात करके परंतु कोई सूचना आपने दी नहीं। जी, श्याम जी बस उसी की
सूचना देने के लि मैंने आपको फोन किया ह,ै मैं और मरे ी श्रीमती जी अपने बेटे
सोहम के साथ आपके घर सीमा को देखने के लि आ रहे हैं। जी-जी राजेन्द्र
बाबू ये तो आपने बहुत अच्छी बात सुनाई। आपका बेसब्री से कल इंतजार रहेगा।
जी तो फिर कल आपसे मुलाकात होती है। जी-जी … राजेन्द्र जी जरूर !!!
श्याम बिहारी बनारस के रहने वाले बहुत ही सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। वह
वि ण्ुत विभाग में सरकारी कर्मचारी के रूप मे कार्यरत थे। उनके चार बच्चे थे, तीन
बेटे और क बेटी। बड़ा लड़का (रमेश) इंजीनियर की नौकरी कर रहा था। बेटी
सीमा म.काम करके बैंकिंग की तैयारी कर रही थी। तीसरा बेटा विजय कॉलेज में
पढ़ता था और छोटा बेटा 12वीं की परीक्षा देकर अपने परीक्षा के नतीजे का इंतजार
कर रहा था। परंतु पिता को अपनी बेटी की शादी की चिंता उसके बी.कॉम पास
करने के बाद से ही होने लगी थी। वे बेटे की शादी के पहले बेटी की शादी करके
थोड़ा अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे, क्योंकि वे भी धार्मिक विचारों का
ही समर्थन करते थे। कन्यादान ही सबसे बड़ा दान है। क पिता को इसी से
मुक्ति प्राप्त होती है। दोपहर के समय सभी खाने में ही कल की तैयारी की चर्चा
करने लगे। हेमा ने पूछा … कल वे आ ंगे तो खाने में क्या-क्या बना ं। आ ंगे तो
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खाना तो हम खिलाकर ही भेजेंगे ? हाँ… हाँ हेमा जी क्यों नहीं ? बिना खाना
खिला हम नहीं जानें देंगे। और सीमा को बता दीजि गा की वो कल कोचिंग
क्लास ना जा , घर पर ही रहे। वैसे वो है कहाँ ? खाने पर क्यों नहीं आई ? कह
रही है कि भूख नहीं है। बाद में खा गी। शायद वो भी कल के बारे में सोच रही है
जी। हमने अपने बच्चों को इतने संस्कार तो दि ही हैं ? देखि कल विवाह की
बात सुनकर ही हमारी बेटी कैसे शर्माकर कोने में छुप बैठी है। (हँसते हु ) हाँ-हाँ
श्रीमती जी आप की बेटी है। आप क्या कम शर्माती हैं। इस उम्र में भी आपका
शर्माना कम नहीं हुआ है। हाँ-हाँ शर्मा-हया ही तो स्त्रियों का गहना है जो पुरुषों
के पास कहाँ ???
सुबह के पांच बज रहे है। श्याम बिहारी आवाज लगाते हु … रमेश !!! उठे
हो कि नहीं ? अभी तक क्या सो रहे हो ? उठो बेटे आज घर में बहुत काम है।
रमेश … जी पिताजी आया। कहिये पिताजी क्या-क्या काम करना है मु ! मैंने
आज छुट्टी ले ली है। घर में आपको मेरी जरूरत होगी और मरे ी बहन को देखने
आ रहे हैं तो भला मैं भी तो देखूं उसके होने वाले दूल्हे को। कैसा है ? वे मेरी
बहन के लायक है कि नहीं। अरे! बेटा! जब माता-पिता इतने समदार है तो बेटे
में भी तो कुछ न कुछ विशेषता होगी। देखो ना! लड़का सरकारी नौकरी करता है
पर इस जमाने में भी अपने पिता की कोई बात नहीं टालता। बड़ा अच्छा सुना है
लड़के के बारे में! तुम भी देखकर तसल्ली कर लेना। वैसे मु तो लड़का पसंद है
– पिछली बार जब कानपुर गया था तभी उससे मुलाकात हुई थी। लड़का बड़ा
होनहार है। संस्कारी है। और तो और सरकारी नौकरी भी है। अगर यह रिश्ता तय
हो जा तो मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि यह लड़का हमारी सीमा के लि
बिल्कुल सही है। अच्छा ! पिताजी जब आपने सब पता कर ही लिया है तो फिर
चिंता की कोई बात नहीं है।
घर में लगभग सभी तैयारी हो गई थी। हेमा – ‘‘रमेश! बेटा रमेश…।‘‘ रमेश
– ‘‘क्या है माँ ?‘‘ सुनो जल्दी से जाकर लड़के वालों को स्टेशन से घर ले आओ।
वो स्टेशन पहुँचने वाले ही होंगे। तुम्हारे बाबू जी मु कह कर बाजार ग थे कि
9.30 बजे रमेश को स्टेशन भेज देना, पर देखो मैं ही भूल गई, तुम्हें बताना और
अब नौ बज रहे हैं। बेटा तू जल्दी जा। जाकर देख। जी माँ, मैं अभी निकलता हूँ।
हाँ-हाँ, जल्दी जाओ। मैं सीमा को तैयार कर देती हूँ। वो भी बैठी होगी।
श्याम बिहारी बाजार से आते ही आवाज लगाते है … हेमा ! हेमा, कहाँ हो ?
लड़के वालों की कोई खबर ? वे बनारस पहुँचे कि नहीं ? रमेश गया उन्हें लेने ?
कहाँ हो तुम ? जी ! आई। हाँ, रमेश गया है उन्हें लेने। आता ही होगा। बाहर
गाड़ी की आवाज आती है। श्याम बिहारी … लगता है वो लोग आ ग । चलो
-चलो देखते हैं।
(लड़के वालों का प्रवेश) जी नमस्ते! आई । राजेन्द्र प्रसाद उनकी पत्नी और
बेटा सोहम तीनों बड़े ही विनम्र भाव से नमस्ते कहते हैं। सोहम ने पहले हेमा और
श्याम बिहारी, दोनों के पैर छु । यह देख रमेश बड़ा खुश होता है। सोचता है कि
पिताजी सही कह रहे थे। लड़का बड़ा संस्कारी लगता है। श्याम बिहारी … जी
आइ । बैठि । आप सभी की यात्रा ठीक थी ना। कोई परेशानी तो नहीं हुई ना
आने में। नहीं-नहीं, जी कोई तकलीफ नहीं हुई और आपने अपने बेटे को तो पहले
ही स्टेशन भेज दिया था। बेचारा वो हमारा इंतजार करते-करते खुद थक गया है।
हम खुद ही आ जाते। बेचारे को हमारी वजह से परेशान होना पड़ा। नहीं-नहीं
परेशानी की क्या बात। भला अपनों के लि कोई परेशान होता है। हेमा जलपान
लेकर आती है। सभी में बहुत हँसी-मजाक चल रहा होता है। श्याम बिहारी हेमा से
सीमा को लाने के लि इशारा करते है।
सोहम सच में बड़ा संस्कारी लड़का था और उसके परिवार वाले भी बड़े
सरल थे। दहेज लेने से उन्होंने पहले ही मना कर दिया था। उन्हें केवल क
सुशील लड़की की तलाश थी। भगवान का दिया हुआ सब सुख-सुविधा उनके पास
थी।
(सीमा का प्रवेश) – श्याम बिहारी खड़े होकर सीमा को अपनी कुर्सी पर
बैठाते है। सोहम के माता-पिता को सीमा पहले से ही पसंद थी। वो केवल अपने
बेटे को सीमा से मिलवाने ला थे, क्योंकि सोहम दिल्ली में नौकरी करता था। वह
वहीं रहता था। सोहम सीमा से कुछ नहीं पूछता है। बस चुपचाप सिर्फ उसे नजर
उठाकर तीन-चार बार ही देखा। सोहम के माता-पिता ने भी सीमा से कुछ नहीं
पूछा। लेकिन उन्होंने सीमा से ये सीधे शब्दों में कह दिया कि -‘‘बेटी देखो ! तुम
अपने जीवन-साथी में जो-जो गु ण देखना चाहती हो, वो सारे गु ण सोहम में है कि

नहीं, वो तुम चाहों तो सोहम से अकेले में बात करके जान सकती हो। सीमा चुप
रही और केवल सिर हिलाकर नहीं का संकेत करके सिर नीचे ुका लिया।
हेमा सभी को खाने के लि आमंत्रित करती है। सीमा अपने कमरे में चली
जाती है। देखते-देखते शाम के पाँच बज गये। सोहम को सीमा अच्छी लगी।
माता-पिता के पूछने पर वह शादी के लि हाँ कर देता है। उसकी हाँ सुनते ही
राजेन्द्र प्रसाद और उनकी पत्नी, दोनों बहुत खुश होते हैं। उन्हें यह खुशी सहन ही
नहीं होती, वो घर जाने का भी इंतजार नहीं कर सकते थे। श्याम बिहारी के घर में
ही दोनों की सगाई की तारीख तय कर दी गई। अगले सप्ताह ही सगाई का दिन
निकला। पंड़ित जी ने सीमा सोहम के छत्तीस के छत्तीस गु ण मिलने की घोष ण
करते हु शादी का मुर्हत सगाई के चार महीने बाद का निकाला। राहुल के माता-
पिता तो शादी जल्द ही करना चाहते थे। पर वे भी शास्त्रो का उल्लंघन नहीं
करना चाहते थे। अतः सगाई और शादी की तारीख तय करके वे कानपुर लौट
गये। श्याम विहारी अपने परिवार के साथ कानपुर जाकर ही सगाई की रस्म पूरी
कर चुके थे। आज सगाई को हु पूरे क महीने हो ग । सीमा भी शादी की
तैयारी के लि आवश्यकतानुसार समाग्री जुटाने में लग गई थी। हेमा जी भी बेटी
के लि गहने-वहने बनवाने मे व्यस्त हो गई थी। बुधवार के दिन जब श्याम
बिहारी जी अपने हॉल में बैठे चाय पी रहे थे, तब अचानक से दरवाजे पर किसी ने
दस्तक दी। रमेश भी घर पर ही था। हेमा जी किचन से निकलकर देखने आती हैं
कि कौन आया है। रमेश उठकर दरवाजा खोलता है, तो सामने सोहम होता है।
रमेश चौंक जाता है कि अचानक बिना किसी सूचना के सोहम यहाँ क्यों आया।
रमेश के साथ-साथ श्याम और हेमा भी इसी प्रश्न को लेकर हैरान हो जाते हैं।
रमेश, सोहम को अंदर आने का आग्रह करता है। श्याम बिहारी – अरे सोहम! बेटा!
आओ-आओ, कैसे आना हुआ ? हेमा सोहम के लि चाय लेकर आओ। जी…. अभी
लाई। बेटा किसी काम से बनारस आना हुआ क्या ? अच्छा हुआ घर आ ग ।
मुलाकात हो गई। सोहम – जी किसी काम से नहीं आया हूँ। मु आपसे ही कुछ
बात करनी थी। श्याम बिहारी बोले हाँ-हाँ बेटा! कहो, क्या कहना चाहते हो ?
सोहम – जी मैं कोई बात घुमाकर नहीं कहना चाहता। और आपसे क विनती भी
है कि मरे ी बातों का कोई गलत अर्थ न निकालें। बहुत सोचने के बाद ही मैं
यहाँ आया। मेरी और सीमा की शादी होने में अभी तीन महीने बाकी हैं। मै जानता
हूँ कि हममें से किसी को इस विवाह से कोई तराज नहीं है। फिर भी मरे ी क
शर्त है। श्याम बिहारी- शर्त ??? कैसी शर्त बेटा! दहेज के लि तो आप लोगों ने
पहले ही मना कर दिया! फिर ये शर्त। सोहम – दहेज के तो हम अब भी खिलाफ
हैं। हमें क पैसा भी नहीं चाहि । श्याम बिहारी – तो फिर कौन सी शर्त की बात
तुम करने आ हो ? सोहम – अंकल, मैं चाहता हूँ कि शादी से पहले सीमा मेरे
साथ दिल्ली चले और इन तीन महीनों में से वो दो महीने मेरे साथ बिता । सोहम
की ये बात सुनकर श्याम बिहारी खड़े हो जाते हैं। रमेश गुस्से से कुर्सी को
पकड़कर अपने पिता की ओर देखने लगता है। हेमा के हाथ से चाय का प्याला
छूट जाता है। सोहम अपनी शर्त बताकर बिना कुछ कहे वहाँ से चला जाता है।
सोहम की शर्त से सभी घर वाले परेशान थे। रमेश तो गुस्से से आग-बबूला हो
रहा था। “पिताजी आपको सोहम बड़ा संस्कारी लग रहा था ना, देखि ! उसके
संस्कार को। उसकी इतनी हिम्मत की वो शादी से पहले सीमा को दिल्ली लेकर
जाने की बात कर रहा है। हमारा कोई मान-सम्मान नहीं है। समाज के लोगों को
इस बात की खबर होगी तो वे थूकेंगें हम पर। कहीं के नहीं रहेंगे हम। बड़ा ही
चालाक लड़का है ! उसने अपनी ये शर्त हमारे सामने सगाई के बाद रखी। अगर
वो यही चाहता था तो सगाई से पहले क्यों नहीं बताया हमें!
श्याम बिहारी ने रमेश के प्रश्नों का कोई जवाब नहीं दिया, और चुपचाप
उठकर अपने कमरे में चले गये। हेमा ने भी अपनी चिंता जताते हु श्याम बिहारी
से पूछने लगी। अब क्या होगा, शादी की तैयारी शुरू कर चुके थे। इतने रिश्तेदारों
में सीमा की शादी की खबर फैल चुकी है। और अब ये शर्त! क्या करें हम! सीमा
भी ये बात सुनकर सुबह से रो रही है। श्याम बिहारी ने कानपुर सोहम के माता-
पिता को फोन लगाया। उनके लि भी शर्त वाली बात चौकाने वाली थी। अपने बेटे
की शर्त के बारे में उन्हें भी कुछ पता नहीं था। वे भी उतने ही दुखी थे जितने की
श्याम बिहारी के परिवार वाले। दोनों परिवार वालों में बहुत विचार-विमर्श हुआ। पर
सोहम ने किसी कि ना सुनी। वो अपनी शर्त पर अड़ा रहा।
सीमा से यह सहा नहीं जा रहा था उसने तो विवाह न करने का नि र्णय भी
ले लिया था। सबके चहरे की मुस्कान ना जाने कहाँ गायब हो गई ! कोई न किसी

से ठीक से बात करता और न ही ठीक से खाना खाता। श्याम बिहारी से यह सब
देखा ना जा रहा था। उसने क दिन सोहम को घर बुलाया।
शुक्रवार की सुबह सोहम सीमा के घर आता है। रमेश अब भी गुस्से में था।
उसने सोहम से कोई बात नहीं की। सीधे पिता की बगल में खड़ा हो गया। श्याम
बिहारी ‘‘देखो बेटा ! तुमने सगाई के बाद इस तरह की शर्त क्यों रखी। यह हम
नहीं जानते। फिर भी हमें तुम्हारी शर्त मंजूर है।‘‘ रमेश अपने पिता जी का यह
फैसला सुनकर हैरान हो जाता है। सोहम भी श्याम बिहारी की ओर देखने लगता
है। कहो, कब सीमा को दिल्ली लेकर जाओगे। मैं उसे कह दूँगा कि वो जाने की
तैयारी कर ले। सोहम – जी, अगले हफ्ते। ठीक है, मैं तैयारी करवा दूँगा उसकी।
सीमा सोहम के साथ दिल्ली आ जाती है। सोहम के इस फैसले से सीमा
पहले ही बहुत दुखी थी और यहाँ आकर उसे बहुत गुस्सा आ रहा था। क हफ्ता
सीमा ने सोहम से बात नहीं की। सोहम उसे दिल्ली की मुख्य-मुख्य जगह के बारे
में बताता पर वह सब बातों को अनसुना कर देती थी। परंतु जब सीमा ने देखा कि
उसके इस व्यवहार पर भी सोहम उसे कुछ नहीं कहता। रहने के लि दोनों के
अलग-अलग कमरे थे। सोहम सीमा से दरू खड़े रहकर ही बात करता था। सीमा
की पसंद के खाने, उसके पसंद की चीजें लाकर घर में उसके सामने रख देता
था। ताकि वो यहाँ खुश रहे। सोहम सीमा की पसंद-नापसंद का खुब ध्यान रखता
था। सीमा भी धीरे-धीरे सोहम को समाने लगी थी। उसकी पसंद-नापसंद का
ख्याल रखने लगी। वे पति-पत्नी तो नहीं बने थे, परंतु दोनों अच्छे दोस्त अवश्य
बन चुके थे। दोनों अपनी हर बातें क-दूसरे के साथ बांटने लगे थे। उनके बीच
किसी प्रकार का मनमुटाव अब नहीं रहा। देखते-देखते दो महीने यूं बीत चले।
सीमा को यह अनुभव होने लगा था कि अगर मैं यहाँ नहीं आती तो शायद सोहम
को सम नहीं पाती। शादी के बाद केवल गृहस्थ जीवन में ही खो जाती।
दो महीने बाद दोनों हँसी-खुशी वापस घर आते हैं। सीमा में बहुत बदलाव
आ चुका था। जो सोहम की तरफ देखती नहीं थी, अब वो सोहम के गु ण-दोष के
बारे में अपनी माँ-पिताजी को क सांस में बताने लगी। ये देख सभी हैरान थे।
सोहम श्याम बिहारी व हेमा के सामने हाथ जोड़कर कहता है – अंकल! मैं सीमा
को इसीलि दिल्ली लेकर जाना चाहता था। इसीलि मैंने यह शर्त रखी थी,

क्योंकि मैं भी चाहता हूँ कि किसी भी लड़की को उसके जीवन-साथी को
समने-परखने का मौका विवाह के बाद नहीं, विवाह के पहले मिलना चाहि ।
आज सीमा मरे े गु ण-दोषों को, मरे े व्यवहार को भली-भां त जान गई है। अब शादी
के बाद वो मेरे घर आयेगी तो मन में किसी प्रकार का डर लेकर नहीं आ गी।
बल्कि अपने साथ ढेरों अरमान लेकर आ गी, जिसे पूरी करने की क्षमता मुमे
होगी। जरूरी नहीं की किसी को समने के लि प्रेम-विवाह ही क तरीका है।
हमारा विवाह प्रेम-विवाह नहीं है। पर विवाह के बाद केवल प्रेम ही रहेगा। हेमा,
श्याम बिहारी और रमेश सभी राहुल की यह बात सुनकर भाव-विभोर हो जाते हैं।
श्याम बिहारी कुछ कह नहीं पाते। वह सोहम को सीने से लगा लेते हैं। घर वालों
के चेहरे पर फिर से वही मुस्कान बिखर जाती है।

-अनुराधा

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