चमेली के फूल

चमेली के फूल

By | 2017-08-03T08:44:48+00:00 July 19th, 2017|Categories: कविता|Tags: |0 Comments

कितना साम्य है,
उस चमेली और इस चमेली में…

वह चमेली
झाड़ी या बेल जाति से संबंधित है
मातृ-पितृविहीन यह चमेली
उससे कम थोड़े ही मानी जाए

पारसी षब्द से बनी वह चमेली
और पारस के संग ब्याही
इस चमेली में कितना साम्य है…

उस चमेली का मूल स्थान
हिमालय का दक्षिणवर्ती प्रदेष है
इस चमेली का मायका भी तो
इसके ससुराल से दक्षिण ही है

मैं उसकी तरह इसे भी
जब पूरा पढ़ गया
मेरा ज्ञान इसके बारे में भी
बहुत ही बढ़ गया
मैं ये जान गया कि
ये सचमुच वही चमेली है,
जो पूरे परिवार के बीच भी
रही सदा पूरी अकेली है

चमेली बेचारी
गर्म या समषीतोष्ण
दोनों ही जलवायु में
और, नम या सूखे
दोनों ही स्थानों पर
सदा जीवित रह लेती है

चमेली के फूल ष्वेतवर्ण
और पत्तियाँ हरी होती हैं
पीतपुष्पी चमेली दिखती ऐसे
जैसे कि वह डरी होती है

चमेली के फूलों से
तेल और इत्र सहित
कई दवाइयाँ भी बनाई जाती हैं
जो, सिर दर्द, चक्कर,
जुकाम आदि में भी काम आती हैं
इसके रस भी तो
वात और कफ से मुक्ति दिलाती हैं
यह षरीर को चुस्त-दुरुस्त
और, अंतर्मन को पुनर्स्फूर्त बनाती है

कथनाषय ये है कि,
चमेली के जड़, तना,
पत्ती और फल अर्थात्
उसके अंग-प्रत्यंग सर्वस्व
लोगों के काम आते हैं
और लोग स्वहितार्थ
उसे काम में लाते हैं

‘निर्दोष’ चमेली इस तरह
परहित के लिए सांगोपांग
न्योछावर हो जाती है…

और, इस तरह
समस्त वातावरण, और
संपूर्ण पर्यावरण को
मह-मह महका जाते हैं –
चमेली के फूल…

– डॉ. गोपाल निर्दोष

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