सपना

सपना

By | 2017-08-01T16:17:40+00:00 July 19th, 2017|Categories: कविता|Tags: |0 Comments

आदमी
जब अपने सपनों को
तिलांजलि देकर
किसी औरत के लिए
बुनता है
एक नया सपना
तब वह बन जाता है पति
और जब पति
पत्नी के ख्वाबों की
दुनिया छोड़
देखने लगता है
अपनी संतान के लिए
एक नया सपना
तब वह पति
बन जाता है पिता
इस तरह एक आदमी
सांसरिक बंधनों के व्यूह में
ता-उम्र ढोता है
सपनों का भार
समझो तो ये भार है
रिश्ते-नाते, प्यार और संसार।

– देवेंद्रराज सुथार

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