भूख..

भूख..

By | 2017-07-31T17:48:33+00:00 July 19th, 2017|Categories: कविता|Tags: |0 Comments

 

कितना तड़पाती है

कितना ललचाती है

पशुओं कि भाँति

मुँह से लार टपकाती है

नज़रों को एक पल भी नहीं हटाती

कही मिल जायेगी

इक टूकड़ा

ये उमीदें है

मन में लाती

पेट रूपी युध्द-स्थल में

आँतडियो से है जंग लड़ाती

तब

भूख शांत कराने

सूखी रोटी

मुँह तक लाने

कल्पना के उड़ान को

जल कि धारा ही

है सम्भालती

सूखे हुये होठों को

कुछ देर शक्ति दें जाती है

शरीर कि अस्थिया भी अब

निकल निकलकर है डराती

आँखों कि पुतलियों को

पेन्डुलम कि भाँति घुमाती

तलाश करने के लिये

भूगोल का मानचित्र भी

आँखों  में अनायास ही

उमड़ आता है

तिल-तिल दानों कि आश में

ना जाने कितने

द्वार ये दिखाता है

विधाता कि लीला भी

निराली है

कही सूखा

तो कही हरियाली है

नियति कि बस

यही कहानी है

भूख सच में बहुत

तड़पाती हैl

 

-अनुराधा 

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