‘प्रेम का प्रेत’

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‘प्रेम का प्रेत’

By | 2017-07-05T22:56:36+00:00 July 5th, 2017|Categories: कविता|0 Comments

अक्सर ही यह सोचकर हुआ मैं प्रसन्न
कि भीतर का आकुल प्रेम मर गया कहीं

कब और कैसे मरा, क्यों मरा, किसने मारा
पता नहीं, कोशिश भी कुछ खास की नहीं जानने की
शायद मरा होगा किसी अपने के स्वार्थ से
कत्ल हुआ होगा समाज की परम्पराओं के चाकू से
जिससे कट जाते हैं खुशनुमा रिश्ते, टूटते हैं परिवार,
बिखरते हैं भविष्य के स्वप्न और नष्ट होता है वर्तमान का सामंजस्य

मैं एक बार पुनः प्रसन्न था कि
वही वास्तविक प्रेम मर के सड़ चुका है कहीं अतीत में,

समाप्त हो चुका है उसका अस्तित्व, आकार
ह्रदयहीन मैं, स्वत्रंत हूँ विचरण को बिना किसी मोहपाश
मन्त्र-तंत्र, त्याग-भोग, दर्शन-विज्ञान, मानव-ईश्वर, घोर-अघोर,
बुद्धि-भ्रम, रोग-शोक, दारिद्र्य-यातना, पशु-पक्षी, कीट-अणुकीट,
इन सब से दूर, पंखहीन उपासक हूँ मैं अब मात्र मृत्यु का,
आराध्य बन चुका है यम, काल है मेरे लिए अब ब्रह्म

फिर सहसा मिल गये तुम, अचानक एक रोज, सड़क पार करते
चश्मे के भीतर उन आँखों में दिखी वही पुरानी प्रीत

अट्टहास कर उठ खड़ा हुआ प्रेम का प्रेत,
दिखाई दिया शाख पर झूलता हुआ बेताल की तरह कालरात्रि में
अंधकार में हुआ आलोक, तप की कठोरता में बह उठी तरंग
रोग में स्वास्थ्य और साक्षात नरक में स्वर्ग सा मोहक
फंस चला था एक बार फिर उसी कण्ठंपाश में, लाचार
प्रशंसा के उस शोर में चल पड़ा शोणित व्यंग्य मेरी ओर चुपचाप

‘प्रेत बनकर प्रेम’ खाने को आया है मेरी देह फिर
प्राण जलते हैं परन्तु प्रसन्न हूँ सोच कर आहार हूँ मैं प्रेम का ।।

 

प्रियाँक ‘असफल’

 

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