पैसों की ना टूटे लड़ी

पैसों की ना टूटे लड़ी

By | 2017-07-05T21:42:58+00:00 July 5th, 2017|Categories: हास्य कविता|0 Comments

विधा–पैरोडी

शीर्षक–पैसों की ना टूटे लड़ी

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पैसों की ना छूटे लड़ी,
दे-दे चंदा घड़ी-दो-घड़ी।

छोटे-छोटे जुगाड़ों को छोड़ो,
इक लम्बा ही अब हाथ मारो।
काले धन की ये फैक्ट्री बड़ी,
दे-दे चंदा घड़ी-दो-घड़ी।

उन नेताओं का कहना भी क्या,
जिनके तन पे सूती-खादी ना हो।
वो नेता,नेता नहीं जिसपे,
धारा चार सौ बीसी ना हो।

स्विस बैंकों में पूँजी खड़ी,
दे-दे चंदा घड़ी-दो-घड़ी।

नेतवा तोरे कारण फूटे देशवा,
पैसवा बिन तोरे लागे ना रे मनवा।

कितना बड़ा भी हो पाप घड़ा,
एक दिन भरना तो भरना है।
कहते अब डंके की चोट पर,
माँ की लाज बचानी भी है।

ज्यादा-कम की है किसको पड़ी,
दे – दे चंदा घड़ी-दो-घड़ी।

आज खुद से ही प्रण है लिया,
सहेंगे मनमानी ना यूँ अब हम।
आगे बढ़के लड़ेंगे सभी,
तेरी रियासत को करेंगे खतम।

लगेगी जल्द ही तुम्हें हथकड़ी,
दे – दे चंदा घड़ी-दो-घड़ी।
……………….

हर्षित मिश्र ‘नमन’

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