बत्ती गुल

बत्ती गुल

By | 2017-07-10T16:51:16+00:00 July 10th, 2017|Categories: व्यंग्य|0 Comments

सरकार ने उच्च पदाधिकारियों के वाहनों से बत्तियां उतारने का फरमान जारी कर दिया | ऐसा प्रतीत हुआ ज्यों किसी के सिर से मुकुट उतार लिया हो |या महारानी के मुकुट में से कोहेनूर निकाल लिया हो |अब अगर कोहेनूर निकाल भी लिया तो था तो वह हिन्दोस्तान का ही |जिसका था उसने वापस ले लिया तो बुरा मानने की क्या बात है |पर कुछ लोग तो यूँ उदास हैं ज्यों इज्ज़त उतर गई हो |जैसे इज्ज़त उस बत्ती में ही कैद थी |
एक बात तो है सडकों की रौनक जैसे खत्म हो गई है |सड़कों पर एक वीरानगी सी है |पहले जब किसी मंत्री या नेता का काफ़िला सड़क से गुज़रता था तो उसकी जलती –बुझती बत्ती और उसके सायरन की आवाज़ से लोग अपने आप पीछे हट जाते थे |मुझे याद है मेरा बीटा छोटा था तो उया सायरन की आवाज़ के साथ गाने लगता था –‘चोर –चोर ,चोर –चोर |मेरे पति उसकी बात सुन कर कहते –‘ठीक कह रहे हो बेटा !हैं तो ये चोर ही |जो लूट कर खा गए पूरा देश |मेरा मन भी थोड़ा उदास तो है ,अब वह पहले सी रौनक नहीं मिलेगी |
मेरे एक नवनियुक्त अफ़सर की भी बत्ती उतर गई |मैं उनसे मिलने गई तो मातम सा माहौल था |मुझे किसी अनहोनी का आभास हुआ तो मैंने पूछ ही लिया –‘सब ठीक है ना |’रुआंसी सी आवाज़ में बोले –‘हाँ !बस वह बत्ती उतर गई |इसलिए सबका मूड ख़राब है |बच्चे कहते हैं कि अब इस कार में नहीं जाएगे |बत्ती के कारण ही तो स्कूल में हमारा रोब था |अब इस कार का क्या फायदा |’
अब कोई पूछे कि तुम्हारे बाप को सरकार ने यह कार तुम्हेँ स्कूल छोड़ने –लाने को नहीं दी है |सरकार का काम करने के लिए दी है |मन में तो आया कि कह दूं –‘सरकार को सभी वाहन ही वापस ले लेने चाहिए |लोग इनका मिस यूज़ अधिक करते हैं |’परन्तु तभी उनकी पत्नी आ कर बैठ गईं और आँखों में आंसू भर कर बोलीं –“हमारी तो किस्मत ही ख़राब है |इन्होंने कितने बुरे दिन देखे |साईकिल पर घूमे ,फिर स्कूटर लिया |अब अगर सुख के दिन आए थे तो यह सब |’
मैंने कहा –‘भाभीजी बत्ती उतरी है बस |कार वापस नहीं ले रही सरकार |’उन्होंने भसम कर देने वाली दृष्टि से मेरी ओर देखा और बोली –‘ऐसी कार किस काम की |रोब तो बत्ती से ही था |’
मैंने भी मातमी चेहरा बना कर उनकी हाँ में हाँ मिलाई |इससे ज्यादा मातम मेरे बस में नहीं था इसलिए वहाँ से चली आई |
शाम को एक नेता जी मिलने आए जो पिछले चुनाव में ही नेता बने थे |साथ में उनका बच्चा और माताजी भी थे |बातों -बातों में उन्होंने भी बत्ती गुल पर रोष प्रकट किया |अत्याधिक भावुकतापूर्ण स्वर में माताजी बोलीं –‘बचपन से कहता था कि बड़ा होकर बत्ती वाली गाड़ी में बैठूँगा |बेचारे के अरमान दिल में ही रह गए |’उन्होंने दुप्पटे की कोर से आँखें पोंछी |शायद उस देहाती महिला को नहीं पता था कि मंत्री या नेता बनना बत्ती वाली गाड़ी में बैठना ही नहीं होता |इस का अर्थ होता है ज़िम्मेदारी निभाना ,देश का विकास करना ,विसगतियों को मिटाना ,स्वयं को देश केलिए ,समाज के लिए अर्पित कर देना |मैंने भैंस के आगे बीन नहीं बजाई |
हम लोग उन्हें घर के बाहर तक छोड़ने आए तो वहाँ से एक एम्बोलेंस गुज़री |बच्चे ने जिज्ञासापूर्वक पूछा –‘इस गाड़ी की बत्ती क्यों नहीं उतरी ?’
सभी को चुप देख कर मैंने उसे समझाया –‘यह गाड़ी मरीजों को अस्पताल तक ले जाती है |ज्यादा बीमार मरीजों को जल्दी अस्पताल पहुँचाने के लिए इसपर बत्ती और सायरन लगे होते हैं ताकि लोग पीछे हट जाए |”
बच्चे को कुछ समझ आया या नहीं |पता नहीं |परन्तु मुझे लगा जैसे बीमार मानसिकता ,अपाहिज नेता और पंगु अफ़सरों को ऐसी ही गाड़ी की ज़रूरत है |

डॉ दलजीत कौर

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