ठोकर ( मुक्तक )

ठोकर ( मुक्तक )

By | 2017-07-11T13:36:08+00:00 July 11th, 2017|Categories: मुक्तक|1 Comment

तुम !  थोड़ी देर और साथ चलते ,

तो अंधेरों में ठोकर न खाती ।

निश्चय ही संभल जाती ।

परन्तु तुम क्या गए ,

तुम्हारे पश्चात् ,

किसी ने  तुम्हारी तरह ,

इतना ना चाह मुझसे।

जितना की तुम चाहते थे मुझे।

और किसी ने चाह भी तो ,

उसमें दया व् सहानुभूति शामिल थ।

ना कोई अपनापन ना कोई  साथ।

हाँ! भटकाने वाले बहुत थे ,मगर

सही राह दिखाने वाला कोई  नहीं मिला मुझे।

और बिना सहारे के ,

बिना मार्ग दर्शन के ,

बिना स्नेह व् अपनेपन के कब तक जीवित रहती मैं !

जितना देर ,कुछ दूर जीवन के सफ़र में चल सकती तो चली ,

फिर थक हार कर रुक गयी।

और इस चलायमान जगत में रुकने का क्या मतलब है

तुम्हें पता है ना।

 

 

 

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संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

One Comment

  1. Om Parkash Sharma July 25, 2017 at 1:49 pm

    सुन्दर सृजन ।

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