उसका समर्पण

उसका समर्पण

By | 2017-07-13T15:09:57+00:00 July 13th, 2017|Categories: कविता|0 Comments

उसका समर्पण
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वह मुझे एकटक देखते ही रह जाती थी।
पास आकर मुझसे बेसुध लिपट जाती थी।।

मुसकुराते हुए वह मुझे देखा करती थी।
आँखों से ही सारे शब्दों को बंया करती थी।।

सावन में भीगना उसे बेहद पसंद था।
मेरे संग झूमना उसे हरदम मंजूर था।।

कुछ बातें प्यार की जब भी मैं करता था।
आँखों में उसके ‘समर्पण’ दिखता था।।

उसकी मौजूदगी में हर पल खास होता था।
उसके प्रत्येक स्पर्श से मैं ‘पुनीत’ हो जाता था।।

वह मेरे प्यार में हमेशा करीब होती थी।
क्योंकि वह मेरे विश्वास पर समर्पित होती थी।।

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