धरती का दुख

धरती का दुख

By | 2017-07-18T15:13:22+00:00 July 18th, 2017|Categories: आलोचना|0 Comments

माँ का रूप दिया तुमने

धरती माता मैं कहलाती

धरा भूमि पृथ्वी जननी

पर्यायवाची हैं शब्द मेरे

दीनबंधु ने भार दिया मुझको

वैभव समृध्दि प्रदान करी

निपुण प्राणी कितना है

मिथ्या छद्मी से बना हुआ

पृथ्वी पर कितना पाप बड़े

नेत्रजल करूणा से भरे

ज्वाला एक भड़कती है

संतप्त हुयी मैं कितनी

वृक्षों से धरतीविहीन हुई

धीरजता की सीमा होती

सुधर जाओ दूनिया वालों

पृलय कहीं न लें आऊं

 

 

 

Comments

comments

No votes yet.
Please wait...
Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

About the Author:

Leave A Comment