दादी और रक्षि – १ (दादोसा)

दादी और रक्षि – १ (दादोसा)

By | 2017-07-24T11:23:50+00:00 July 24th, 2017|Categories: कहानी|0 Comments

”रक्षि!” सो जा बेटी दिनभर से खेल रही है, अब तो सो जा । अभी नहीं सोयेगी तो कल सुबह स्‍कूल कैसे जायेगी।

माँ की पुकार का भी रक्षि पर कोई असर नहीं पड़ा, वो बस अपनी गुडि़याओं के साथ खेलने में मस्‍त थी । यूं तो उसका पूरा नाम रक्षिका था, पर घर में सब उसे प्‍यार से रक्षि बुलाते थे ।

”रक्षि!, सो जा बेटी, मेरी रानी बेटी है ना, आओ मैं तुम्‍हें सुला दूं”

”नई मुदे दादी से तहानी सुन्‍ना है, मैं अभी नईं सोऊं, मुझे नीद नई आ रई ए”

रक्षि ने अपनी माँ के आग्रह को फिर ठुकरा दिया । यूं तो रक्षि साफ-साफ बोल लेती है, पर जब उसे अपनी कोई बात मनवानी हो तो कुछ ज्‍यादा ही तुतलाने की कला का इस्‍तेमाल करती है और उसकी तुतलाहट के आगे सब नतमस्‍तक नज़र आते हैं । अत: दादी उसके पास आयी और हमेशा की तरह दादी ने एक नई कहानी उसे सुनानी शुरू की –

एक बड़े शहर के बाहर एक छोटी सी चाय की दुकान थी, उसी दुकान के पास कुछ पेड़ थे, उनमें एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ था । अन्‍य छोटे पेड़ थे, जिनमें इमली, नीम, बबूल, शीशम, पीपल आदि कई शामिल थे । बरगद का पेड़ वर्षों पुराना था, इसीलिये वो उन सभी पेड़ों में सबसे बड़ा था और सभी पेड़ उसे दादोसा कहते थे।

दादी!, ये दादोसा क्‍या होता है, रक्षि बीच में ही पूछ बैठी ।

राजस्‍थान में राजपूत आदि दादाजी को दादोसा कहा करते थे, इतना कहकर दादी ने कहानी को आगे बढ़ाया –

कई वर्षों पहले एक तूफान से बचने के लिये एक सिद्ध महात्‍मा ने दादोसा अर्थात् बरगद के पेड़ के नीचे आश्रय लिया । दादोसा ने भी अपनी टहनियों की मदद से महात्‍मा को तूफान से बचाने का प्रयास किया, उसके इस दयालु भाव से प्रसन्‍न होकर महात्‍मा ने  जाते-जाते दादोसा को एक वरदान दिया कि ‘वो किसी भी मनुष्‍य की भाषा को सुन व समझ सकते हैं’।

दादोसा दिनभर उनके सामने स्थित चाय की दुकान पर बैठे मनुष्‍यों की बातें सुनते और रात को अपने परिवार (समस्‍त वृक्षों) को सुनाते । कई बार मनुष्‍यों द्वारा की गयी मनोरंजक बातों से सभी वृक्षों को इतना आनन्‍द आता की वो लोग जोर-जोर से हँसने लगते। रात्रि में आस-पास से आने-जाने वाले लोग उन पेड़ों को अचानक जोर-जोर से हिलते देख डर जाया करते, उन बेचारों को क्‍या पता रहता कि ये समस्‍त वृक्ष हँस-खेल रहे हैं । फलस्‍वरूप आस-पास के इलाकों में यह बात फैल गयी कि इस बरगद के पेड़ पर कोई बुरी आत्‍मा रहती है। वैसे भी अन्‍धविश्‍वास के तो पंख ही विशाल होते हैं तो चारों ओर खूब जोरो-शोरों से इस बात की चर्चाएं होने लगी ।

दूसरे ही दिन चाय की दुकान पर भी इन्‍हीं अफवाहों की गरमा-गरमी रही, परन्‍तु दुकान के मालिक ने इस बात को सिरे से नकार दिया। चूंकि उस बरगद की छाया दुकान पर पड़ती थी, अत: आने-जाने वाले लोग इस वृक्ष के नीचे सुकून पाते थे, साथ ही चाय की चुस्‍की भी भर लेते थे । ऐसी अफवाहों की वजह से उस बेचारे की दुकान पर आवाजाही कम हो सकती थी, जिसका उसे भय था ।

रात होने पर जब दादोसा ने सभी वृक्षों को ये बात बताई तो सभी जोर-जोर से हँसने लगे ओर बोले कि मनुष्‍य इतना बेवकूफ और अंधविश्‍वासी भी होता है। अचानक दादोसा ने सब को चुप रहने को कहा, क्‍योंकि पास में से कुछ लोग निकल रहे थे, हालांकि उन वृक्षों को हिलते हुये उन लोगों ने पहले ही देख लिया था और मन में कुछ बड़बड़ाना शुरू भी कर दिया था । अचानक वृक्षों के यूं हिलते बन्‍द हो जाने से उन मनुष्‍यों में श्‍वास का संचार हुआ । सभी वृक्षों ने उनको आश्‍चर्य से देखा कि ये क्‍या बड़बड़ा रहे हैं परन्‍तु किसी के कुछ समझ नहीं आया और दादोसा से पूछ भी नहीं पाये ।

अगले दिन चाय की दुकान पर फिर उन्‍हीं बातों का सिलसिला चालू हो गया, तभी दो लोग आकर दुकान पर बैठे, ये वही लोग थे जो रात इधर से गुजरे थे । उनमें से एक गांव का मुखिया था और एक पुरोहित ।

मुखिया जी के आते ही उनको बैठने की जगह दी गयी और गरमा-गरम चाय पेश की गई। मुखिया जी ने चाय की चुस्‍की लेते हुये कहा – ”भाई रामधन! अपनी दुकान यहाँ से हटा लेना कल से” ।

‘क्‍यों माई-बाप मुझसे क्‍या गलती हो गई’ दुकान मालिक रामधन ने डरते हुये हाथ जोड़कर पूछा़ ।

‘यहाँ बुरी आत्‍माएं रहती हैं, इस बरगद के वृक्ष पर’ पुरोहित जी ने कड़कते हुये शब्‍दों में कहा ।

”कल रात मैं और मुखिया जी गाँव में उड़ रही अफवाहों की सच्‍चाई जानने के लिये इधर से गुजर रहे थे तभी अचानक जोर-जोर से सारे वृक्ष हिलने लगे, वो तो मैं था साथ में सो मैंने तुरन्‍त हनुमान कवच का पाठ शुरू किया और उन वृक्षों का हिलना बंद हो गया ।”

पुरोहित जी की बातें सुनकर वहाँ उपस्थित समस्‍त भयभीत हो गये और मुखिया जी से उन वृक्षों को कटवाने का आग्रह करने लगे । साथ में पुरोहित जी ने भी यही उपाय बताया, परन्‍तु रामधन को अपनी रोजी-रोटी छिन जाने का भय था, तो उसने मुखिया और पुरोहित के खूब हाथ-पैर जोड़े। अन्‍तत: मुखिया ने यह फैसला पंचायत पर छोड़ दिया और दूसरे दिन पंचायत बुलाने को कहकर वहाँ से चले गये । उस दिन दुकान बन्‍द करने के बाद भी काफी रात तक रामधन सिर पर हाथ रखकर वहीं बरगद के नीचे बैठा रहा । दादोसा ने खूब सोचा कि वो रामधन को बता सके कि यहाँ कोई बुरी आत्‍मा नहीं रहती, पर वो चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाया।

रात को दादोसा ने सभी वृक्षों को सारी बात बतायी तो सारे भयभीत हो गये, क्‍योंकि कल शायद पंचायत उन्‍हें काटने का फैसला सुनाओ दे। सब को आश्‍चर्य और दु:ख हुआ कि मनुष्‍य कितना निर्दयी है जो हम बेजुबानों को हँसने-खेलने की इतनी बड़ी सजा देगा ।

अन्‍तत: दूसरे दिन की सभी प्रार्थनाएं करने लगे, समस्‍त वृक्ष रामधन का परिवार और कुछ रामधन के हितैसी, जो नित्‍य रामधन की दुकान पर आया करते थे, ये सभी पंचायत का फैसला रामधन के पक्ष में होने की दुआएं कर रहे थे ।

दूसरे दिन शायद भगवान् ने वृक्षों की सुन ली पंचायत में रामधन और उसके परिवार के रोने-गिड़गिड़ाने और कुछ लोगों द्वारा उनका समर्थन करने से पंचायत ने कहा कि अगर रामधन उसी वृक्ष के पास रहना प्रारम्‍भ करे तो वो वृक्ष काटे नहीं जायेंगें । रामधन ने स्‍वीकार तो कर लिया, परन्‍तु अन्‍दर ही अन्‍दर वो भी भयभीत था, क्‍योंकि उसकी एक छोटी सी बच्‍ची थी वो कहीं डर ना जाये, इसका उसे भय था ।

उसका वह भय भी उसकी बेटी मुनिया ने यह कहकर भगा दिया कि “टीचर कहती है बुराई को अच्‍छाई से जीता जा सकता है । अत: वह उसकी चिन्‍ता ना करे” ।

बस फिर क्‍या था रामधन ने दूसरे ही दिन पेड़ के पास ही अपनी झोपड़ी बना ली और अपने परिवार के साथ वहाँ रहने लगा। मुनिया भी वहाँ आकर खुश थी, क्‍योंकि उसके लिए वहीं पेड़ पर झूला लगा दिया गया था, जिस पर वह झूलती रहती थी। साथ ही समस्‍त पेड़ों के प्राण बच गये थे, तो वो भी सारे खुश थे और बहादुर रामधन की यथा शक्ति मदद करते रहते थे । तेज तूफान में उसकी झोपड़ी की रक्षा करते, उसके घर में भोजन पकाने के लिये अपनी सूखी डालियों को गिरा देते, जब कभी बरसात में रामधन की झोंपड़ी चूने लगती तो अपने पत्ते उसकी झोपड़ी पर गिराते, जिससे पानी का चूना कम हो जाता । ऐसे ही कई प्रकारों से समस्‍त पेड़ उनकी सहायता करते या यूं कहें कि उनका जीवन बचाने का अहसान चुकाने की कोशिश करते ।

दादी ने कहानी सुनाते-सुनाते रक्षि की तरफ देखा तो वो सो चुकी थी ।

दूसरे दिन सुबह उठकर रक्षि समय से स्‍कूल गयी और दादी द्वारा सुनाई गयी रात कि कहानी से प्रेरित हो अपने बाल सखाओं को समझाती रही –

  1. पेड़ काटना बुरी बात है।
  2. कोई आत्‍मा वात्‍मा नहीं होती ।
  3. बुराई को अच्‍छाई से जीता जा सकता है ।

रात को फिर एक नई कहानी के इन्‍तजार में रक्षि ने पूरा दिन खुशी-खुशी निकाल दिया और रात होते ही दादी की गोद में सिर रखकर बोली – दादी! दादी!! तहानी थुनाओ ना और फिर उसकी तुतलाहट के आगे नतमस्‍तक हो दादी ने नई कहानी सुनानी शुरू की …….

क्रमश :दादी और रक्षि – २

        © Sanjay Kumar Sharma “Prem”

 

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