हमशक्ल

हमशक्ल

By | 2017-07-25T00:37:51+00:00 July 25th, 2017|Categories: कहानी|0 Comments

सुबह के 10.30 बज गये और मैडम अब कदम रख रहीं हैं ऑफिस के अन्दर। ये लगभग रोज की कहानी है। कितनी बार समझाया लेकिन ना तो ये देर से जागना छोडेगी और ना ही देर से ऑफिस आना। लेकिन गलती सिर्फ प्रज्ञा की नही हैं, इससे पहले वह एक कॉल सेन्टर पर जॉब कर रही थी सो उसे रात को जागने और दिन मे सोने की आदत है। मै जानता हूॅ कि वह अपनी तरफ से कोषिष तो कर रही है लेकिन कामयाब नही हो पा रही।
“गुड मॉर्निग सर। आपने बुलाया था?”
“यैस प्रज्ञा। अन्दर आ जाओ।”
प्रज्ञा आकर सामने की कुर्सी में बैठ गयी।
“तो तुम आज भी देर से आयी हो। अब तुम अपने आने का समय बदल रही हो या हम इस ऑफिस का समय बदल दें?”
“नही सॅर, मै कल से पन्चुअल,,,”
“ऑई होप से,,,गे टू योर वर्क।”
प्रज्ञा आज से करीब 5 महीने पहले मुझे मिली थी। कहीं नौकरी करने के लिए इसमें बस एक ही खूबी है और वह ये, कि प्रज्ञा मेहनती है।
जो किसी भी छोटी से छोटी लापरवाही को अपने ऑफिस में बर्दाष्त नही करता, वह प्रज्ञा के इतने लापरवाह रवैये को कैसे बर्दाष्त करता होगा? क्यों बर्दाष्त करता होगा? वजह बहुत अजीब है। उसे देखकर पता नही क्या हो जाता है कि हर एहसास बस एक दबी सी हॅसी में बदल जाता है। उसे देखकर ऐसा लगता है मानों मेरी जया वापस आ गयी है,,,लेकिन मै जानता हूॅ कि ये सच नही है।
जया! मेरी जिन्दगी का वह नाम जिससे मेरा दिल ऐसे जुडा कि फिर मेरे सारे रिष्ते इस नाम के मोहताज हो गये। वह मेरी जिन्दगी में कभी आ न सकी लेकिन हॉ, मेरी बीवी का नाम जया है। मेरे घर की दीवारें उस रंग की है जो उसे पसन्द था। मेरे बगीचे में उसकी पसन्द का हर फूल खिला है। मैने पूरी कोषिष की उसे अपनी दुनिया में बिखेर देने की, अब कामयाब कितना हुआ ये तो मै खुद नही जानता।
मै कवि! कॅालेज की पढाइ्र्र खत्म करते ही पिताजी ने मुझे दिल्ली वापस बुला लिया। उनको और उनके कपडे की मिल को मेरी जरूरत थी। मै उनका एकलौता बेटा था। यहॉ आने के बाद मुझे कभी अपने लिए वक्त नही मिला। मै भी उसी तरह जीना चाहता था जैसे एक 24 साल का कोई भी लडका जीना चाहेगा लेकिन पिताजी के सामने किसी की चलती नही थी और फिर वह वक्त भी और था। मॉ बाप के सामने बच्चों के लिए मुॅह खेलना, चुनौती होता था। मै इस चुनौती को कभी स्वीकार नही कर पाया। मेरी जिन्दगी में सब कुछ पिताजी के अनुसार ही चलता था। मै अपनी जिन्दगी में बदलाव के इन्तजार में था और अचानक, एक दिन वह हो भी गया!
बारीष में नहायी एक ताजगी भरी सुबह। करीब 9 बजे, बेहद जल्दबाजी में मै मिल के लिए निकला। पिताजी के मुताबिक उस दिन मुझे काफी देर हो गयी थी और उनकी कडवी बातें सुन सुनकर मेरा अपना मूड भी कडवा हो चला था। उसी कडवाहट के साथ मैने आधा रास्ता तय किया होगा कि सडक के किनारे खडी एक लडकी ने लिफ्ट मॉगकर मेरा ध्यान खीच लिया। षायद, वह भी जल्दी में थी। उसकी हडबडाहट से तो यही लग रहा था।
“प्लीज आप मुझे आगे चौक तक छोड सकते है? मेरी बस छूट गयी और दूसरी आने में काफी वक्त लग जायेगा। प्लीज?”
चिन्ता और घबराहट की कई बारीक लकीरें के पीछे भी किसी का चेहरा इतना खूबसूरत लग सकता है? बारीष की बूॅदों से भी ज्यादा खबसूरत!
”जी ,,,हॉ आईये।” मुझे कुछ पल लगे थे खुद में लौटने में।
जब तक वह मेरे बगल में आकर बैठ नही गयी तब तक क्या हो रहा है, कुछ समझ नही आया। ऐसा नही था कि मैने किसी लडकी को पहली बार देखा था या वह उन सबसे खूबसूरत थी जिनसे मै अब तक मिला था लेकिन ऐसा लगा, कि बस इसे ही मिलना चाहता था हमेषा से।
वह रास्ते में कही उतरना चाहती थी लेकिन मैने उसे उसके ऑफिस तक छोडा। उस दिन वह षुक्रिया कहकर चली गयी लेकिन उस दिन के बाद मै हर सुबह उस रास्ते से गुजरते हुए उसको जरूर तलाषता था। कभी कभी वह मिल जाती और कभी कभी नही। फिर कुछ दिनों बाद ऐसा वक्त भी आया कि वह रोज ही मिलने लगी। जब तक वे मिल नही जाती, मै उसका इन्तजार करता था। एक दो महीने में ही हमें एक दूसरे की आदत हो गयी। हमारे बीच कभी दोस्ती का रिष्ता नही बना, हमारी षुरूआत ही उसे रिष्ते से कहीं आगे थीं।
जया एक गरीब परिवार से थी और उसे हमारा मेल-जोल कभी उचित नही लगा। उसे मेरे प्यार पर भरोसा था लेकिन मुझ पर नही। मै उसे अपने घरवालों से मिलाना चाहता था लेकिन वह कभी इस बात के लिए राजी नही हुईं।
“कवि, मै ये नही कह रही कि तुम बस यूॅ ही मेरे साथ हो। इतना जी चुकी हूूॅ इस समाज में कि इन्सान की पहचान है मुझे। मै जानती हूॅ कि तुम सच्चे हो लेकिन मै नही खपूंगी तुम्हारे परिवार के साथ कवि! वह लोग मुझे कभी पसन्द नही करेगें। तुम अपने रूतबे के अनुसार कोई अच्छी लडकी ढूंढ लो। मै….मै तुम्हारे लायक नहीं हूॅ।”
मै ये बात जया से बेहतर जानता था कि उसके लिए अपने परिवार को मनाना लगभग नामुमकिन होगा लेकिन उस दिन जया की बातां ने मुझे मेरे एक डर के सामने ला खडा किया। मै अब और ऑखें नही मूॅद सकता था। मैने उसी दिन अपने पिताजी से बात की।
जया की कही हर बात मेरे घर में दोहरायी गयी लेकिन लहजा उससे बहुत बुरा था। पिताजी ने कभी गरीबी नही देखी थी, उनके लिए गरीब को समझना मुमकिन नहीं था लेकिन मैने पढाई के दौरान ऐसे कई दोस्त बनाये थे जो गरीब थे इसलिए मै गरीब और गरीबी देनें के समझता था, अपना सकता था। पिताजी को जया से कोई समस्या नही थी, बस वह उस लकीर को पार नही कर पा रहे थे जो जाति, धर्म और हैसियत के नाम पर कभी हम इन्सानां ने ही खीचीं थी। मै अपने पिताजी से जया को लेकर और बहस करता लेकिन मै उसकी गरीबी का और अपमान नही सह पाया। मैने पिताजी से उनका आखिरी जवाब मॉगा। उन्होनें फैसला सुना दिया कि मै या तो उनका नाम और घर को छोड दूॅ या उस लडकी को!
ये बात मैने जया से बॉटी। उसने वही जवाब दिया जो मैने सोचा था। उपदेष देने मे वह भी पीछे नही थी।
”कवि , आज तुम मेरे लिए सब कुछ छोड भी दे तो क्या होगा? मै तुम्हे परेषान करने के लिए या दुंख देने के लिए तुम्हारी जिन्दगी में नहीं आयी थी। ये जो कुछ हो रहा है उसका अन्दाजा मुझे पहले ही था इसीलिए रोकती थी तुम को कि मुझे लेकर सपने मत देखो।”
“लेकिन मै खुद को नही समझा सकता जया।”
“तो? क्या करना है? छोड सकते हो सब कुछ? गरीबी को जानते हो, समझते हो ये ठीक है लेकिन गरीबी को जीना इतना आसान नहीं है। तुम्हारा घर, गाडी, खुद का ऑफिस, नौकर…इस सब की आदत है तुम्हें। रह सकेगे इनके बिना? हमें ये गरीबी , ये जिन्दगी भगवान ने दी है, तब हम इसे नही झेल पाते और तुम इसे खुद से चुनकर…जिन्दगी भर पछताते रहोगे।”
पिताजी और जया दुनियादारी समझते थे लेकिन दिल को नहीं। उस दिन जया ने जो कुछ कहा उसे मै महसूस करना चाहता था।
षाम को ऐसे ही घर से टहलने निकल पडा। काफी दूर तक पैदल चला। बहुत आगे निकल आया और जब वापसी के बारे में सोचा तो सॉस रूक गयी। गाडी में चलने के आदि मेरे ये पैर जवाब दे रहे थे। बिना गाडी के चलना इतना मुष्किल हो रहा था तो जिन्दगी कैसे चलती? मै वापस आ गया। गाडी, ऐष आराम के बिना जी सकता हूॅ या नही ये मै जान चुका था और अब ये देखना था कि क्या मै जया के बिना जी सकता हूॅ? तीन दिनां तक मै उससे नही मिला। उससे कोई बात नही की। उसे देखा तक नही और तीन दिनां में मुझे एहसास हो गया कि इस ऐष-आराम के बिना जीना मुष्किल होगा लेकिन जया के बिना तो जीना मुमकिन ही नहीं है। अपना जवाब लेकर मै बडी खुषी से उससे मिलने के लिए उसके ऑफिस गया, पर वह नही मिली। उसने एक दिन पहले ही नौकरी छोड दी थी। घर गया तो पता चला कि उसके परिवार ने अपना कोई कर्ज चुकाने के लिए मकान बेच दिया है और अब रोहतक चले गये है।
मै सब कुछ हार गया। उस हार का एहसास ऐसा था कि मै उससे कभी बाहर ही नही निकल पाया। मेरे पिताजी को जब मेरे प्यार की गहराई पता चली तो उन्होने भी जया को ढूढने की हर कोषिष की लेकिन वह कही नही मिली। मुझे इस अफसोस से बाहर निकालने के लिए मेरी षादी की बात चलने लगी। जया के जाने के करीब दो साल बाद मेरी षादी हुई। उस लडकी को मैने देखा तक नही था लेकिन उसके लिए हॉ कर दी क्योकि उसका नाम जया था। मैने उस नाम से ही षादी कर ली।
आज मेरे पास जया के प्यार के अलावा सब कुछ है। एक अच्छी पत्नि। दो बेटे। पिताजी की छोडी हुई जायदाद। करोबार, सब कुछ! बस एक जया की कमी थी जिसे प्रज्ञा ने पूरा कर दिया है….लगभग। जया की तरह ये भी मुझे सडक पर ही मिली थी। ठीक उसी तरह जैसे वह मिली थी।
एक रात मै अपने किसी दोस्त के घर से लौट रहा था कि फिर लडकी ने मुझसे लिफ्ट मॉगी। जया के बाद मै किसी के लिए गाडी नही रोकता था लेकिन उस लडकी को देखते ही मेरे पैर ब्रेक पर खुद ही दब गये। मेरे मुहॅ से खुद ही निकल गया!
“जया??”
मैने गाडी वापस ली और उसके पास जा रूका। एक पल को मै धोखा खा गया कि ये जया है, लेकिन ये जया नही हो सकती थी। इसकी उम्र 22 की होगी और जया की उम्र इस वक्त होनी चाहिये कम से कम 43 साल! वक्त और उम्र आगे बढ गये हैं। मुझे अपनी बेवकूफी पर हॅसी आ गयी लेकिन वह बिल्कुल जया थी। बस जया 20वीं सदीं में जी रही थी और ये मोहतरमा तो 21वीं सदी से भी आगे जा चुकीं थीं। बेहद षॉर्ट स्कर्ट, कई रंगों में रंगी लटें, कानें में फॅसे एॅयर पीस और हाथ मे सिगरेट! मैने उसे गाडी मे बैठने को कहा और साथ ही सिगरेट फेंक देने को भी।
मै सुन्न हो चुका था। मै उससे कुछ पूछ ना सका लेकिन उसने खुद ही अपने बारे में मुझे सब कुछ बता दिया। नाम, काम और कहॉ रहती है। मेरे दिमाग में कुछ और ही सवाल थे जिन्हें रोकते रोकते भी मै पूछ ही बैठा –
“आप की मम्मी का नाम क्या है?”
“जी??” वह चौंक सी गयी और फिर- ”संगीता देवी।”
ये उसकी बेटी नही।
“आपकी कोई बडी बहन? कोई ऐसा जो आपके जैसा दिखता हो?”
“नही, ऐसा कोई नही है, क्यो?”
“नही ऐसे ही।”
उसने बताया कि वह किसी कॉल सेन्टर में काम कर रही है। आज कैब मिस कर दी तो बस के लिए खडी हो गयी। वे इस काम से खुष नही थी। मैने उसे पता नही क्यों अपना कार्ड दिया और आकर मिलने को कहा। वह अगले ही दिन मेरे ऑफिस आयी और मैने उसे अपने यहॉ नौकरी दे दी। प्रज्ञा मुझे मिली और उसके बाद जो हुआ वह खुद ब खुद होता चला गया। यकीनन मैने जानकर कुछ नही किया।
हम दोने में लगभग उम्र भर का फासला था फिर भी मै उसकी तरफ खिंचता था। मैने उसे अपने यहॉ नौकरी दी ताकी वह मेरी ऑखें के सामने रहे। मै ना जाने क्यों उसकी चिन्ता करता था? ना जाने क्यां लगता था कि वह हर वक्त खुष रहे? जो सारी खुषियॉ मै जया को न दे सका वह सब मै प्रज्ञा को देना चाहता था। उसकी बच्चों जैसी गलतियॉ, बिना बात का गुस्सा, उसकी हॅसी, इस सब ने मेरी जया को एक नया रूप दे दिया जो उसके अपने व्यक्तित्व से बडा अलग था। फिर भी मै खुष था कि जिन्दगी भर मेरी जया इस रूप में मेरे सामने रहेगी लेकिन एक दिन इस खुषी को भी मेरी नजर लग गयी।
कुछ तीन चार महीनां बाद ही मेरी अस्सिटेन्ट ने आकर बताया कि वह नौकरी छोड कर जा रही है। उसे अॅास्ट्रेलिया से कोई आफॅर आया था। जया को मै एक बार खो चुका था और अब प्रज्ञा को खोकर फिर से उसी एहसास से नही गुजरना चाहता था। मै अपनी सीमा जानता था लेकिन फिर भी खुद को समझा नही पा रहा था। मुझे लगा कि मुझे उसे समझाना चाहिये, रोकना चाहिये।
एक षाम घर लौटते समय मैने उसे अपनी गाडी से उसके हॅास्टेल तक छोडा और बहुत ही झेंपते हुए-
“प्रज्ञा, मैने कुछ सुना है तुम्हारे बारे में।”
“क्या सॅर?”
“कि तुम नौकरी छोडना चाहती हो। सैलरी कम है?”
“नही सर, सैलरी की दिक्कत नही है। मेरी एक सहेली जा रही है वहॉ, उसने मेरे लिए भी वहॉ काम ढूॅढा है। मुझे लगा ये मौका फिर नही मिलेगा।”
“तुम्हारे घर वाले राजी है भेजने को?”
“नही सॅर, बिल्कुल नही लेकिन मै उनको समझा दूॅगी।”
“प्रज्ञा वहॉ अकेले रहना सेफ नही है। तम्हे कुछ पता है वहॉ की जिन्दगी के बारे में?”
“हॉ टी वी में देखा है, इन्टरनेट पर पढा है।”
“गुड! टी वी में देखने में और जाकर रहने में फर्क होता है प्रज्ञा। मै तुम्हारे घर आकर बात करूॅगा इस बारे में। तुम्हें अक्ल नही है लेकिन तुम्हारे घर वालो के तो होगी।”
प्रज्ञा को नहीं समझ आया कि मै ये सब क्यां कह रहा हॅू। वह मेरी ईज्ज्त करती थी इसलिए उसने बडे षान्त षब्दों में मुझे ऐसा न करने को कहा। पैसा कमाना उसकी मजबूरी थी। मै उस पर ज्यादा दबाव ना डाल सका।
प्रज्ञा अब नोटिस पीरियड में काम पर थी। कुछ 10-15 दिनां में वह यहॉ से चली जायेगी, ये सोच मुझे जैसे नोचं रही थी। मै उसे कुछ भी कर के बस रोकना चाहता था, कैसे भी! जया की तरह वह भी दुनिया की ठोकरें खाये, ये मै सोच भी नही पा रहा था। प्रज्ञा के जाने से जया के जाने का अहसास फिर से ताजा होने लगा। मै कोई रास्ता निकालना चाहता था कि उसे रेक सकॅॅू। डर था कि वह अपनी जिन्दगी ना खराब कर ले।
एक रोज इसी सोच के साथ में अपने कमरे में अन्धेरा किये बैठा था कि यष ने आकर मुझे चौका दिया।
“आप किस सेच में बैठे हो डैड?”
“कुछ नही…ऐसे ही।”
“लग तो नही रहा कि आप ऐसे ही यहॉ बैठे हो। कुछ तो बात है। आजकल आप कुछ छुपाते हो हम सब से।”
“यष, मै तेरा डैड हूॅ कि तू मेरा?”
“नही वह तो आप ही हो लेकिन हम देस्त भी तो है। कम से कम अपनी प्रॅाब्लम मुझे तो बता ही सकते हो आप।”
मैने अपनी समस्या बयान करने से पहले थोडा सोचा और-
“यष, कोई लडकी जिसे आप हमेषा सुरक्षित, सुखी रखना चाहते हैं उसके लिए सबसे बेहतर रास्ता क्या हो सकता है? कोई ऐसा रास्ता है जिसे समाज भी स्वीकार कर सके और आप खुद भी।”
“वैल! ये तो निर्भर करता है कि आप उसे किस नजर से देखते है?”
“ये नजर बीच में कहॉ से आ गयी? आप नही चाहते कि सामने वाला समाज में ठोकरें खाये, परेषान रहे….”
“तो फिर उसे घर ले आइये, हमेषा के लिए।”
“घर?”
“हॉ मै तो यही करूॅगा।”
“करूॅगा मतलब?”
“डैड…आई एम इन लव।”
उसने झेंपतें हुए कहा।
यष की दिखायी राह पहले तो बेहद बेतुकी लगी। एक ऐसा रास्ता जो है ही नही या हो ही नही सकता लेकिन फिर उसी के प्यार में मुझे मेरा रास्ता दिखायी देने लगा।
दे दिन बाद जब प्रज्ञा आखिरी बार मुझसे मिलने आयी तो मैने उसे अपनी सारी कहानी सुना दी। उसके सामने षादी का प्रस्ताव रखा और जैसी मुझे उम्मीद थी उसने मना ही किया। वह आखिर तक राजी नही थी। मेरे जोर देने पर उसने मुझे सिर्फ अपने घर आने की इजाजत दे दी। मै जया और यष को लेकर उसके घर वालों से मिलने गया। प्रज्ञा के पिताजी का देहान्त हो चुका था और प्रज्ञा पर अपनी माताजी और छोटे भाई कि जिम्मेदारी थी। उसके घर वालां के सामने भी समाज, भेद भाव, उॅच-नींच की वही पुरानी समस्यायें खडी थी जो कभी मेरे घरवालों के सामने थीं। कई दलीलें, कई मिन्नतों के
बाद उसकी माताजी का फैसला हमारे पक्ष में हो गया लेकिन प्रज्ञा के लिए ये फैसला काफी मुष्किल था। उसने हमसे वक्त मॉगा। दो दिन बाद उसका जवाब आया, जो हॉ में था।
जया को खोकर जो हार गया था, हॉलाकी वह कभी नही जीत सकता लेकिन फिर भी मुझे खुषी थी कि मैने वैसा ही कुछ पा लिया था।
आज मेरे घर से प्रज्ञा का नया रिष्ता जुडने वाला है। बारात निकलने वाली है उसके घर के लिए। मै और यष एक साथ मेरे कमरे में तैयार हो रहे थे कि जया ने आ कर परेषान करना षुरू कर दिया।
”कवि, बारात इन्तजार कर रही है। आप और कितना वक्त लगाओगे तैयार होने में?”
“मै वक्त लगा रहा हूॅ? अपने बेटे को कहो कि आईना छोडे ताकि मेरे तैयार होने की बारी आ सके।”
“ठीक है मै बारात को भेज देती हूॅ , आप दोनां बाद मे चले जाना। या फिर जा ही क्यों रहे हो? मेरे साथ यहीं रूक जाओ।”
“जया, तुम सच में नही चलोगी?”
“नहीं , मै यही रहूॅगीं।”
उसकी बात सुनकर यष आईने से हटा और उसके सामने आ खडा हुआ।
“मम्मी आप किन पुरानी बातों में पडी हुई हो? चलो ना! यहॉ अकेली क्या करोगी?”
“क्या करूॅगी मतलब? दिया जलाकर इन्तजार करूॅगी अपनी बहू के आने का। जैसा मेरी सास ने किया था। यही तो कर्तव्य है एक सास का।”
उस षाम यष ने कहा कि प्यार हमारे अन्दर होता है जिसे हम प्यार करते है उसमें नही। ये किसी के चले जाने से प्यार खो नही जाता।
ये पानी की तरह है जिस बर्तन में रख दें उसी का आकार प्रकार ले लेता है। इसे हम बॉध नही सकते लेकिन इसके बहने की दिषा जरूर तय कर सकते है। किसी गलत दिषा में बहकर ये बाढ ला सकता है और सही दिषा में बहकर बंजर जमीन को हरा भी कर सकता है।
हमारे सारे एहसास एक जैसे ही होते है बस हम उनको अलग अलग तरीके से महसूस करते है। सच सिर्फ खुषी या दुंख है बाकी सब, उनके पर्याय। जैसे जया और प्रज्ञा हमषक्ल होकर भी अलग हैं वैसे ही दोंनों के लिए मेरा प्यार भी हमषक्ल है, लेकिन मै उसे अलग तरीके से महसूस करता हूॅ।

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