बावली पावस

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बावली पावस

By | 2017-08-01T16:20:39+00:00 July 19th, 2017|Categories: कविता|Tags: |0 Comments

बाग के पौधे, प्यासी धरती
मुॅह खोले निहार रही है
मुक नयनों से अंतरिक्ष में
तेरे आने की प्रतीक्षा है
सब को-
मुॅह को खोल, जीभ निकालकर
हॉफते हुए पषु को भी
बुॅद भर जल की तलाष में
प्यासों की श्रृंखला बनाकर
अनन्त यात्रा पर जाती हुई
चींटियों को भी
तेरे आने की प्रतीक्षा है-
मरूथल में, अस्तित्व को खोते
सिक्ता-कणोें को
दीर्घ तपन से ढीले होते
पत्थर को
नहर, नाले, गड्ढे और तालाब को
और झुलसते हुए फसलों को भी
तेरे आने की प्रतीक्षा है।
तुम आती भी हो,
पर, फुहार बन के
गरम ताबे पर जल की दो
बुॅदे पड़ी हो जैसे।
बढ़ जाती है सबकी प्यास
और दुगुनी हो जाती है जलन
मृग भागता रहता है-
मरीचिका के पीछे-पीछे।
सामने वाला तालाब-
कहॉ भर पाया इस बार भी,
और सारे गड्ढ़े भी तो खाली ही बच गए।
खेत मुॅह खोले बिलबिला रहा है,
कहॉ बंद हो पायी, इस बार भी दरारें।
लगता है- भूत कही ठहर कर
कर रही हो- सेन्धमारी वर्त्तमान में
और भविष्य को खोखला।
सृष्टि का अंत जैसे निकट हों।
आओ, अब तो आ जाओ
चुपके नहीं, खुलकर
फुहार नहीं, वर्षा बन
सब की प्यास बुझा जाओ
अरी बावली पावस!

-अरुण कुमार निराला 

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