क्षणिकाएं

क्षणिकाएं

By | 2017-08-04T12:08:28+00:00 August 4th, 2017|Categories: कविता|0 Comments

जख्म

सूरज के चेहरे पर
घाव हो गया
सारी मरहम
चांद ले गया
जख्म नासूर बन रहा है
चांद हंस रहा है
🌺

निष्कर्ष

एक निष्कर्ष
जंगल कटते जा रहे हैं
जंगली बढ़ते जा रहे हैं
🌺

शरबत

हाथों में लहू के जाम
चेहरे पर आत्मीयता का नकाब

कोई नहीं पहचानता
लहू किसका है यह
सभी समझते हैं
वे तो शरबत पी रहे हैं।
🌺

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