जिन्दगी के दिन

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जिन्दगी के दिन

By | 2017-08-06T11:16:52+00:00 August 6th, 2017|Categories: कविता|0 Comments

संसार है ये अनुरागी मन
ये विराग कहां से आया है
उदय हुआ है फूल अगर
अस्त भी होना निश्चित है
अन्तरंग चाहे बन जाए मन
बहिरंग में बहना मुमकिन है
प्रतिकूल ये सृष्टि हो जाए
अनुकूल हमी को बनानी है
अर्पण कर दी जिन्दगी तुझको
ये गृहण कहां से आया है
प्रेम की अतिवृष्टि बरसी
अनावृष्टी कहां से आयी है
हम अमर नहीं है दुनिया में
मृत्यु का आना निश्चित है

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