सारथी

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सारथी

By | 2017-08-07T19:57:40+00:00 August 7th, 2017|Categories: कविता|1 Comment

ये तीन अश्व, मेरा अक्स
और मेरा मन ही तो हैं
मैं ही तो हूँ
जो बन जाता है
कभी सफेदपोश
तो कभी मटमैला
और ओढ़ लेता हूँ कभी
श्याम रंग की कामरी,
मैंने भी तो साध लिया है
मन को एक साधु की तरह
किसी भी रूप में हूँ,
कैसा भी हूँ,
पर शांत, दुनिया से बेखबर
स्वपोषन में लगा,
एक ही धुन में,
परोस रहा हूँ खुद को,
और इस मन को, जो
पहले से भी ज्यादा
ताकतवर,
जिंदगी भी लग रही मुझको
शांत नदी सी बहती ,
पर कुछ तो बेमेल है,
मेरे अक्स को निभाते,
इन अश्वों में,
मुँह मोड़ अलग दिशाओं में,
साथ आते अगर,
तो मैं भी कृष्ण की भाँति
बन सारथी
एक नए युग का
करता निर्माण।

रंजन मगोत्रा

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One Comment

  1. Amita Gupta Magotra August 7, 2017 at 8:47 pm

    बहुत उम्दा रचना

    अमिता

    Rating: 3.0/5. From 3 votes. Show votes.
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