एक संघर्ष नया

एक संघर्ष नया

By | 2017-08-10T23:29:55+00:00 August 10th, 2017|Categories: लघुकथा|0 Comments

एक संघर्ष नया
स्कुलकी लाइब्रेरी से निकलते हुए सामने ही राजगढ़ गांव की स्कुल के प्रिंसिपल नीरजा जी को उनकी छात्रा राजवी मिल गयी।
“टीचर ,इस परीक्षा में भी मुझे बहोत अच्छे मार्क्स मिले है.”
“बहुत बढ़िया ,ऐसे ही महेनत करती रहो”
“लेकिन,मेरे पिताजी तो अभी में ११ वी कक्षा में हूँ, और मेरी शादी तय करने जा रहे है ”
“अरे ,ये तो बहोत गलत हो रहा है और कानून के भी विरुद्ध है ”
“लेकिन जब से मेरे पिताजी हमारे एरिया के विधायक हुए है तब से कोई कानून भी नहीं मानते और मेरे भाई ने भी पढ़ाई छोड़कर पार्टी कार्यालय परही अड्डा जमा रख्खा है ”
“ठीक है ,मैं समजाने की कोशिश करुँगी ”
निर्जाजी जबसे शहर से शादी करके इस गांव में आयी थी ,तो इतने बड़े घर की बहु स्कुल में शिक्षिका का काम करेगी इस बारे में भी गांव में काफी बातें चली थी लेकिन अपने पति के सहयोग से उन्होंने भी अपनी महेनत और लगन से आज आचार्या बनी और स्कूल की लाइब्रेरी में ऑनलाइन शिक्षण के किसीभी उम्र में पढ़ सके ऐसे वर्ग भी शुरू करवाए ।
नीरजाजी ने राजवी के पिताजी को समझाया लेकिन,’ ये तो हमारे समाज का नियम है’ कहकर टाल दिया ।फिर स्कुल के एक समारोह में उन्हें प्रमुख बनाया और लड़कियों की पढाई पर जोर देता हुआ भाषण भी दिलवाया ।उतने में भीड़ में से लोगो ने धमाल मचायी और बोलना शुरू किया ,
“अरे ,आपतो अपनी छोटी छोटी लड़कियों की शादी करवा देते हो .हमारा क्या उद्धार करोगे ?”
नीरजा जी ने जैसे तैसे समारोह निपटाया और विधायकजी से माफ़ी मांगते हुए, “माफ़ कीजिये ,११ वी कक्षा की लड़की को शादी करके घरपर बिठा देना ये तो सरासर जुल्म है ,इस लिए ये भीड़ थोड़ी आक्रोश में आ गयी थी .”
और विधायक जी फिर भी गुस्से में,
“में ऐसे सब लोगो की परवाह नहीं करता “कहकर चले गए .नीरजा जी समाज चुकी थी के इनको समजा ना आसान नहीं .
ऐसी ही थोड़े दिन गुज़र गए और नीरजा जी सुब्हे स्कुल जाने निकली तो किसीने दौड़कर आकर खबर सुनाई
“जल्दी चलिए ,राजवी ने नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली है ,उसकी ओढ़नी और पुस्तके किनारे पर मिले है, एक चिट्ठी भी लिखकर गयी है की मुझे पढ़ने की बजाये जबरदस्ती शादी करवा रहे है, तो मेरी जीने की इच्छा नहीं ।”जल्दी से नीरजा जी ,विधायकजी के घर पहुंची ।विधायकजी दहाड़े मारकर रो रहे थे ,
‘अरे ,कोई मेरी बेटी राजवी को वापस लाओ ,हम उसे कुछ नहीं कहेंगे.मेरी भूल से मैंने उसे गवा दिया ”
और धीरे से नीरजाजी ने एक धरमें छूपाइ हुई राजवी को लाकर पिताजी के आमने खड़ा कर दिया ।
उसके पिता उससे लिपटकर बहोत रोने लगे ।
फिर नीरजा जी बोली ,”माफ़ कीजिये आपको समजानेका मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था ,इसलिए ये नाटक करना पडा ।फ़र्ज़ कीजिये की ऐसा कुछ हो जाता तो हम सब अपने आप को कभी माफ़ नहीं कर पाते ।बच्चे जब बड़ो की ज़िद से मजबूर हो जाते है तो कुछ भी कर बैठते है। ”
अस्तु ।
-मनीषा जोबन देसाई

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