टॉयलेट : एक प्रेम कथा  उर्फ कलुआ

टॉयलेट : एक प्रेम कथा  उर्फ कलुआ

By | 2017-11-08T10:58:56+00:00 August 17th, 2017|Categories: व्यंग्य|0 Comments

“हैरी मेट सेजल” का  फ्लॉप होना , दर्शकों का थियेटर  से गालियां देते हुए निकलना  तथा लंबे  वीकेंड के आस पास  टॉयलेट एक प्रेम कथा का सिनेमाकी रजत पर्दे पर आना और हिट हो जाना यह  भारतीय सिनेमा के लिए शुभ शगुन है.

अरबपति और अवार्ड विनिंग अभिनेताओं , निर्माताओं , निर्देशकों  के लिए एक करारा जवाब भी है कि कब तक कनाडा , यूरोप , स्विट्ज़रलैंड में“इडिओटिक फॅंटॅसी”  गढ़कर  पब्लिक को  फूल बनाते  रहोगे.

कभी क..क..क… किरण , कभी सिनॉरीटा , कभी अंजली -अंजली कह कह कर बाहें फैला -फैला  कर खूब “माल” और “पुरस्कार” बटोरे. अब वेघिसी -पिटी स्टोरी का दौर गया .

मगर अपने अक्की भाई ( अक्षय कुमार ) ने पब्लिक की नस पकड़ कर रखी  है और हेरा फेरी के बाद से  साल में दो से तीन फिल्मों के  हिट  देने केफ़ॉर्मूले  की जो आदत पकड़ी है वह अभी तक बरकरार है .

हाल के वर्षों में “जॉनी एलएलबी” हो “गब्बर” हो , “हॉलिडे” हो या “एअर लिफ्ट”    . माहौल जब  देशभक्ति का हो तो हॉलीडे और एयर लिफ्ट चलपड़ती है . अपाहिज सिस्टम से लोग बेहाल होकर , करप्शन के खिलाफ सड़कों पर निकलते है तो  गब्बर चल जाती है. अक्की भाई बड़े इज़्ज़त औरएहतराम से  जोली एल एल बी बनकर ज्यूडिशियरी पर पंच दे डालते हैं.

आज कल  देश में  “प्रधान सेवक”  की हवा बह रही है . गांधी बापू के गोल चश्मे पर स्वच्छ भारत दिख रहा है. डर्टी पिक्चर वाली “विद्या बालन “शौचालय की सरकारी ब्रांड आंबेसडर बनकर

” शौचालय बनवाए ” का संदेश दे रहीं हैं.

अपने अक्की  भाई भी इस नेक काम  में कहाँ पीछे रहने वाले थे . मुद्दे को ” रॉडी राठौड़” की तरह लपका और “एंटटेरमेंट” की तरह तैयार . बड़ेछुपे ” रुस्तम ” हैं अपने ऐक्शन कुमार . इस बार भी  अपने तरकश से ऐसा तीर निकाला  कि कोई इस सब्जेक्ट पर पहले सोचा भी नहीं था .

टॉयलेट…..एक ऐसा शब्द जिसे हम  पब्लिक में चर्चा करना भी वियर्ड समझते हैं. मगर आजकल हर कोई एक दूसरे से पूछ रहा है -“छुट्टियों मेंटॉयलेट  देखी क्या ?”

“मैंने तो देखी …..और तुमने ?”

बच्चे समझ नहीं पा रहे हैं कि  पेरेंट्स साथ साथ ” टॉयलेट” जाने का प्रोग्राम क्यों बना रहे हैं.

बॉय फ्रेंड – गर्ल फ्रेंड  एक साथ  ” टॉय लेट ” देखने को जा रहे हैं

फिल्म देखने से पहले  इंटरनेट पर रिव्यू  पढ़ना एक ” प्रूडेंट दर्शक ” की पहचान बन गयी है.

मैंने भी जब इंटरनेट पर रिव्यू खंगला  तो ”  धांसू ”   , ” फॅंटॅस्टिक ” , बेस्टम बेस्ट ” ,  ” मोदी सरकार की तरह एफेक्टिव ” और ना जाने क्या क्या लिखा हुआ पढ़ा .

एक अति उत्साही ‘टिंग  टॉंग’ नाम के यूजर ने  तो यह भी ट्वीट कर दिया की ” टॉयलेट तो  टाइटॅनिक को भी  खा जाएगी ”

मैं सोचा, ‘टिंग टॉंग भाई बढ़िया कंपॅरिज़न कर  लेते हो. आपके  फिल्मी ज्ञान को नमस्कार …..स्टीवन स्पीलबर्ग काका के भेजे में अगर यह आइडिया कुछ दशक पहले आया होता तो वे ज़रूर  “टाइटैनिक”  की जगह “टॉयलेट :अनइंडियन जर्नी ” ऐसे ही कुछ  नाम से पिक्चर बना  डालते’.

खैर टॉयलेट का सब्जेक्ट एकदम कॉन्टेंप्ररी ( समकालीन ) , रेलवेंट ( प्रासंगिक) और  यथार्थ है मगर केवल भारत के संदर्भ में.

इसे कान्स या गोल्डन ग्लोब फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जाए तो

” टॉय लेट ”  को शायद वहां के दर्शक  समझ ही नहीं पाएंगे  और सोचेंगे ” हे मैन !  मॉर्निंग नेचुरल कॉल कैन बी डन इन ग्रीन फील्ड विथ मॉर्निंग कूलब्रीज़ , वॉट अन कूल आइडिया सर ,  इंडिया इज ग्रेट ”

 

कल मुझे कलुआ दिख गया फल के ठेले वाला कलुआ .  पूछने लगा , ” साहब ,  फिल्म देखी …टॉयलेट ….?”

 

वहीं मेरे बगल में खड़े सेव तुलवाते हुए चतुर्वेदी जी ने ” राम-राम-राम ”  कहते हुए उसे डांटा और कहा , ”  पूजा के लिए फल बेचता है और टॉयलेटटॉयलेट करता है ”

दरअसल 70 वर्षीय  चतुर्वेदी जी  नहीं समझे कलुआ किस संदर्भ में बात कर रहा था . वे  बमक कर दूसरे फलवाले ठेले  की ओर बढ़ गए .

मैंने कलुआ से  कहा , ”  लो तेरा एक ग्राहक तो गया , टॉयलेट के चक्कर में ”

वह भी गुटखा थूकते हुए कहा , ” जाने  दो सर ,  खडूस  , ढाई सौ ग्राम  सेव लेता और  20 मिनट मुझसे भाव ताव करता .

मैने  कलुआ को मोटीवेट करने के लिए कहा , ” तू भी तो झोपड़पट्टी में रहता है .एक शौचालय बनवा ले घर में . सरकार भी शौचलय बनवाने के लिए पैसे  देती है. ”

वह गुटखा से  खराब हुए दांत निपोरते हुए कहा , “साहब , यह फिल्म तो हम लोग जैसे के  बारे में ही तो है. हमारे  गांव में भी सब खुले में होता है . यहाँ शहर में भी रेल की पटरी किनारे.  कोई झंझट नहीं , कोई टेंशन नहीं .  इस पिक्चर के असली हीरो  तो हम ही हैं.

आगे उसने कहा , ” अक्की  भैया ने क्या काम किया है  झकास . एक दम मस्त . हंसा हंसा कर पेट फुला दिया . लुगाई  भाग जाती है , लुगाई केभागने के दरद में   ” संडास ” का संदेश देने लगते हैं . बग़ावत कर डालते हैं.”

मैंने फिर से अपना सवाल दोहराया , ” अब तो सुधार जा . इस फिल्म का हीरो  तुझसे फिल्में चीख चीख कर कह रहा है टॉयलेट बना ,  टॉयलेट बना .और तुम इसे हँसी मज़ाक में केवल ले रहे हो.

वह बोला , ” अगर अपन लोग सुधर गये . शौचलय बनवा लिए तो स्टोरी ही खल्लास . कहानी ही ख़तम . अभी तो हमें  ” टॉयलेट : एक प्रेम कथा :- २ ,३  का भी इंतेज़ार है . जैसे गोलमाल १ , गोलमाल २ , गोलमाल ३.

उसके तर्क सुनकर मैं सन्न रह गया .

रचनाकार:- गौतम कुमार सागर , वडोदरा ( गुजरात)

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About the Author:

नाम :- गौतम कुमार सागर वडोदरा ( गुजरात) आयु :- 38 वर्ष लेखन कार्य :- विगत बीस वर्षों से हिन्दी साहित्य में लेखन. दो एकल काव्य संग्रह प्रकाशित . एक लघु कथा संग्रह , तीन साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित . विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित . अखिल भारतीय स्तर पर " निबंध , कहानी एवं आलेख लेखन " में पुरस्कृत.

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