कुछ आप सा

कुछ आप सा

By | 2017-09-07T20:53:25+00:00 September 7th, 2017|Categories: व्यंग्य|0 Comments

सोचता हूँ मै भी “कुछ आपसा ” बन जाऊ,
ठुकराऊ इतराऊ देखूँ और निकल जाऊ ।।
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क्या रखा् हैं दुनिया मे रिस्तों मे नातो मे,
मोम सा हूँ पिघलू और पत्थर बन जाऊ ।।
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आते जाते रहते है सब लोग फरेबों जैसे,
कर कुछ झूठी तारिफे,मुस्कुराऊ और मुकर जाऊ।
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बीच भवर मे कश्ती भी क्यो लगायें अब गोतें,
जिस पार हो पास किनारा उछलू और उतर जाऊ।
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क्या खूब सिखाती थीं माँ भी दुनियादारी बचपन मे
कौन अपना कौन पराया जिभर रोलू और सो जाऊ,
।।
.
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@@@@Anil ranjan@@@@@@@

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A beautiful mind beautiful heart

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