भीड़ का चरित्र (कविता)

भीड़ का चरित्र (कविता)

By | 2017-09-09T10:11:45+00:00 September 9th, 2017|Categories: कविता|1 Comment

भीड़ का चरित्र (कविता)

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एक रास्ता है

कि कई रास्ते हैं

मंजिल के

कोई कुछ कहता है

कोई कुछ

इतिहासकार, राजनीतिज्ञ,

वैज्ञानिक, दार्शनिक

सबके अपने – अपने मत हैं

विचारकों – विश्लेषकों के

चिंतन के ठहराव के बीच

भीड़ का चरित्र

बिल्कुल अलग है

वह तो अंतिम छोर के आगे की

खाईं में भी कूद जाती है

सही – गलत पर

बाद में पछताती है

लेकिन पीछे वालों के लिए

वही रास्ता

और नजीर बन जाती है

– भोलानाथ कुशवाहा

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One Comment

  1. Bholanath Kushwaha September 9, 2017 at 11:22 am

    कविता शामिल करने के लिए आभार – भोलानाथ कुशवाहा, मिर्जापुर (उ.प्र.)

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