प्रद्युम्न हत्याकांड

प्रद्युम्न हत्याकांड

By | 2017-09-30T21:14:00+00:00 September 30th, 2017|Categories: कविता|0 Comments

क्या भेष बना ज्ञान के मन्दिर का नफ़रतों के नित शूल बोये जा रहे

श्वेत वस्त्र की देवी के घर में कैसे मानवता के उसूल खोय जा रहे

ज्ञान धर्म की बना के बगिया माली तुम संहारक बन बैठे

कुछ तो बोलो मक्कारों क्यूँ ? प्रद्युम्न जैसे फूल सोये जा रहे

 

अखलाकों के मरने पर सब दुम हिलाकर जाते हो

जल्लादों की फांसी रुकवाने रात न्यायालय आते हो

मासूम पुष्प की निर्मम हत्या पर कुछ प्रश्न दिखाई देते हैं

राजनीति के गलियारे अब क्यूँ शांत सुनाई देते है

 

पाखंडी वैश्याप्रेमी को कर्मो की सजा सुनाई जाती है

लाखों मर मिटने को आते हैं जब जेल दिखाई जाती है

तब उन लाखों में एक न आया नामर्दों की टोली से

हरियाणा के सुन्दर की जब सोणी लाश दफनाई जाती है

 

यदि निकट अवधि चुनाव की होती, तब

बन विपक्ष वोट की खातिर पूजा हवन वहीं करा देते

माँ बेटा या चाचा नेताजी सब एक कतार मे आया करते

सांसद न रहता एक शेष संसद भवन वहीं बना लेते

 

मेरी आँखों का तारा था वो दुनिया भर से न्यारा था

मेरे जिगर का टुकड़ा था वो गगन चंदा सा मुखड़ा था

रोशन था जहाँ उससे ,वो उस दुनिया में कैसे खो गया

ये पाप कैसे हो गया,, मेरा लाल कैसे सो गया ।

……ये पाप कैसे हो गया …. मेरा लाल कैसे सो गया

 

#अभिनव_दीक्षित

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