चूडी नहीं ये मेरा दिल है………

चूडी नहीं ये मेरा दिल है………

By | 2017-10-21T07:30:58+00:00 October 21st, 2017|Categories: आलेख|0 Comments

चूडी है नारी के हाथ का अलंकरण, वृत्ताकार आकृति लिए रंगबिरंगी सोनें चांदी कांच आदि से निर्मित आैर मोती, हांथीदांत से सज्जित, विवाहित महिलाओं के लिए सुहाग का प्रतीक, तो अविवाहित लडकियों के लिए फैशन। चूडी पहनना सिर्फ आभूषण पहनना नहीं हैं वरन भारतीय महिलाओं की पुरातन सभ्यता और संस्कृति का अंग है और सोलह श्रंगार का एक हिस्सा भी। उत्तर प्रदेश में विवाह के अवसर पर हरे रंग की कांच की चूडियां पहनाई जाती है जो समृद्धि की प्रतीक मानी जाती हैं। हिन्दू धर्म में कोई भी त्योंहार हो चाहे करवा चौथ हो या होली दीवाली, हरितालिकातीज या भैया दूज, चूडी पहनना हमेशा से सौभाग्य सूचक रहा है।

नवविवाहिता को चूडी इसलिए पहनाई जाती है ताकि उसकी आनें वाली जिन्दगी प्यार और स्नेह से भरी रहे। दुल्हन के हाथ अगर चूडियों से ना भरे हो तो चाहे वह कितनें भी आभूषण पहनें हो सब बेकार हैं। भारत में किसी भी धर्म की महिला हो उसका चूडी मोह कभी कम नहीं होता है। चूडी की बहुत सी वैराइटी हैं जो सोना, चांदी, पीतल, प्लेटिनम, कांच, प्लास्टिक, लकडी, सीप, हाथी दांत और फेरस मैटेरियल से बनती है। उत्तर प्रदेश और उसके आसपास की गरीब महिलायें कांच की चूडियां पहनती है तो अमीर सोनें या आइवरी की, राजपूत महिलायें रंगबिरंगी चूडियां पहनती हैं तो बंगाली महिलायें हांथी दांत और मूंगे से बनी हुई। कुछ गुजरात की और राजस्थान की आदिवासी अविवाहित महिलायें हड्डियों की बनी हुई चूडियां भी पहनती हैं जो कलाई से शुरू होकर कोहनी तक जाती हैं और विवाहित महिलायें कोहनी से उपर तक। बहुत जगह ‘लाख‘ की चूडी लोहे की चूडी और सफेद सीप की चूडी भी पहनी जाती है। बहुत से प्रान्तों में विवाह के अवसर पर शादी की रस्म में दूल्हे द्वारा दुल्हन को चूडी पहनानें की रस्म भी होती है।

चूडी भारत के प्रागैतिहासिक काल की नारी मूर्तियों में भी देखनें को मिलती है। मोहनजोदडों और हडप्पा की खुदाई में मिली नारी मूर्तियों में नारी हाथ चूडी से अलंकृत मिले है। मौर्य काल और शुंग काल में महिलाओं के दोनों हाथ चूडियों से परिपूर्ण होते थे। अंजता और एलोरा से प्राप्त नर्तकी के चित्रों में भी हाथों में चूडियां सुशोभित हैं। खजुराहों की मूर्तियों में नायिका के दोनों हाथों में रत्नजडित दो दो चूडियां हैं।

रामायण काल में चूडी के प्रचलन का उल्लेख रामचरितमानस में मिलता हैं। महाभारत में शंख की चूडियों का वर्णन है। मध्यकाल में सूरदास नें भी दोनों हाथों में चार-चार के जोडें के रूप में चूडी का वर्णन करते हुए लिखा है “‘डारनि चार-चार चूरी बिराजति।”

किसी महिला का किसी महिला को चूडी भेट करना उसके लिए सौभाग्य का प्रतीक है तो किसी पुरूष के लिए अकर्मण्यता और अपना पौरूष सिद्ध ना कर पानें का परिणाम। जब किसी प्रेयसी के हाथों में चूडी खनखनाती है तो उसकी मधुर ध्वनि सुन के प्रेमी का मन मयूर नृत्य करनें लगता है। जो चूडी निर्माण की प्रक्रिया में अनेक पुरूषों के हाथों से होकर गुजरती है और किसी प्रेयसी  के हाथों में खनखन की आवाज से प्रेमी को सम्मोहित कर देती है वही चूडी जब पुरूष को भेट की जाती है तो पुरूष के लिए पुरूषत्व सिद्ध करनें की चुनौती बन जाती है।

पुरूषों को चूडी भेट करने की परम्परा भी बहुत पुरानी रही है। यह विरोध करनें का एक परम्परागत तरीका है जिससे हमारे भ्रष्ट नेतागण और प्रशासनिक अधिकारी अकसर रूबरू होते रहते है लेकिन कुछ भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों को चूडी भेट करो या पहना भी दो इनकी सेहत पर कोई अन्तर नहीं पडता क्यों कि ये अकर्मण्य थे और अकर्मण्य ही रहेगें।

हो सकता है कि हमारे कुछ मित्र भी अपनी पत्नियों से अकसर यह सुनते रहते हो कि “आपको तो कुछ करना नहीं आप चूडी पहन के घर में बैठियें मै सारे काम खुद ही कर लूंगी” ।

 

—- सुरेन्द्र श्रीवास्तव

Comments

comments

Rating: 4.6/5. From 6 votes. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

About the Author:

Leave A Comment