चाह

चाह

By | 2017-10-30T22:47:14+00:00 October 30th, 2017|Categories: कविता|1 Comment

चाह

है तुमसे मोहब्बत कितनी ,
कि हम खुद नहीं जानते हैं।
तेरे सिवा ज़िन्दगी में न आये कोई,
बस यही दुवाओं में खुदा से है मांगते।
न भाता है दिल को कोई,
न मानता है अपना किसी को सिवा तेरे।
न सूरत से प्यार है न शरीर से,
इस दिल को तो सिर्फ तेेेरे दिल से प्यार है।
न चाहत है ना चाह बाँकी है,
दिल में सिर्फ उनका निशां बाँकी है।
कोई जीत ले हमसे सब कुछ शिवाय तेरे,
फिर से सब पाने का हुनर अब भी बाकी है।

 

सुबोध कुमार

30.10.17

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  1. Madhulika October 31, 2017 at 11:23 pm

    Apni chahat pr hamesha bhrosha rkhana

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