एक हसीन ख्वाब

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एक हसीन ख्वाब

By | 2017-11-13T19:49:46+00:00 November 13th, 2017|Categories: कविता|0 Comments

आज ख्वाहिशों से परे,हमने एक हसीन ख्वाब देखा,

ना हसरतें देखी, ना ही उसमें कोई अरमान देखा।

हकिकत के सांए में एक उजला नायाब तोहफा देखा,

माँ के पाक कदमों में  जन्नत का दीदार देखा,

पिता के पलकों के सांए में अपना रोशन जहां देखा।

उस पल कई रहनुमाई को, सपने से हकिकत में देखा,

माँ की दुआओं के साथ पिता का बेइन्तहा प्यार देखा।

आँखे छलक पडी उसके वक्त! माँ के आँचल से,

नम आंखों को पोंछते हुए फिर से देखा,

पिता के हाथों को सर पर सहलाते हुए बार -बार देखा।

पलकें खुलने को तैयार नहीं! माँ का ऐसा दुलार देखा,

आज ख्वाहिशों से परे, हमने एक हसीन ख्वाब देखा,

ना हसरतें देखी,ना ही उसमें कोई अरमान देखा,

माता -पिता के चेहरे पर खुदा का नूर ही नूर ही देखा। “

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