सहायता

सहायता

By | 2018-01-01T22:24:43+00:00 December 5th, 2017|Categories: आलेख|Tags: |0 Comments

मानव जाति परस्पर सहयोग से अपनी पहचान और विशिष्टता को स्थापित कर पाई है, अनुभूति की अपार शक्ति का खजाना मानव मन की सर्वोत्कृष्ट संपदा है, हर व्यक्ति में दया, माया, ममता, मधुरिमा और अगाध विश्वास का असीम कोश हृदय रत्न नीधि में भरा पड़ा है पर पीड़ा से संवेदनशील व्यक्ति की भीतरी भाव किरण अनायास ही विषम परिस्थिति में दुसरे की पीड़ा को बाँटना चाहती है, यह मनोभाव स्वाभाविक मानव वृत्ति की पहचान है, और उसी अनुरूप मानव के व्यक्तित्व की पहचान होती है ।
विशुद्ध सहयोग की भावना संबंध नही ढूंढती , व्यक्ति का भीतरी कोमल द्रवित अंश स्वयं के रस का परित्याग कर निर्बल ,विवश , असहाय और पीड़ित व्यक्ति की चेतना से बंध जाता है, उसके भीतर की दशा से स्वयं आत्मसात हो जाता है  ऐसे में त्याग की अंतिम पराकाष्ठा को पार कर सहयोग के लिए तत्पर हो जाता है परिणाम के मूल यथार्थ को भूला हुआ विशुद्ध रूप से दिव्य लक्षणों से आबद्ध होकर हर सामर्थ्य की सीमा तक सहयोगी बन जाता है । ।इस पर ध्यान देने की जरूरत है कि यह कृत्य जब तक स्व रस त्याग की मनोभूमि पर रहता है तब तक ठीक है परंतु यदि स्वभाव का दुसरा पक्ष अंश सूत्र के रूप में भी जुड़ा हुआ है तो नही आवश्यक की वह विस्तार पाकर शोषण का हथियार नही बन सकता,  ऐसा बहुत संभव है, अतः सहयोग की यथार्थ भूमि बीच किसी भी दशा मे स्वार्थ के बीज अंकुरित नही होने पायें ।
मनोविश्लेषण का कार्य बहुत जटिल है और यह बड़ा जोखिम भरा भी है, हमारा मन ऐसे चलता है कि यदि कोई हमे समझाने लगे कि जीवन निस्सार है तो हमें उसमे अधिकाधिक सार नजर आने लगता है, यह हमेशा विपरीत चलने मे रूचि लेता है, इसलिए यदि हम इसे दमित करने लगे या मारने लगे तो यह और अधिक रसमय हो जाता है, हम दबाये चाहे समझाये कोई फर्क नही पडता, और यही कारण है कि जिन्दगी की सच्चाई तक पहुंचने से पहले मन से लडना होता है ।हम जो भी चेष्टा करते है वह सारी अमनोवैज्ञानिक है, क्योंकि इससे मन को बल मिलता है और मनोभूमि विराट होती चली जाती है, मन का किसी दीन हीन की सहायता के लिए जुटना एक स्वाभाविक क्रिया है जिसे हम अपनी प्रज्ञा से परिमार्जित कर सभ्यता का आवरण गढते है । और इस सुन्दर कृत्य को भी मतलब की प्रज्ञा से रंग कर चमकदार बना देते है ।
आज जीवन मानसिक दशा मे रूग्ण हो चुका है, लालच और संग्रह की प्रवृत्ति ने मानव व मानवता के दरम्यान गहरा अंतराल पैदा कर दिया है, बनावट , अहंकार और भौतिकता का नशा व्यक्ति की मूल चेतना को खा चुका है और बाहर भीतर के गहरे फासलो ने शरीर और आत्मा के बीच की खाई गहरी हो चली है, आज सहयोग की भावना संबंध पर आधारित है, स्वार्थ के परिणामों पर निर्भर है, लाचार विवश जन आज घृणा का पात्र बना हुआ और सभ्यता की सारी योजनाऐ  उसको जड से मिटाने के लिए बन रही है ।
ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी सहायता का कोई महत्व नही, जो चिल्ला चिल्ला कर हमें दी जाये ,क्योंकि उसके पीछे बहुत गहरे अर्थ छीपे हुए हैं पुख्ता इंतजाम हैं हमे मिटाने के, क्योंकि कोई भी व्यक्ति आज के युग में सहायता का रत्न उछालता हुआ नही घुमता , बहुत बड़े प्रयोजन की सिद्धि के लिए यह उसका कर्म का प्रदर्शन मात्र है ।
हम जीवन को विखंडित नही होने दे ,जैसा कि आज शिक्षा की चतुर चालाकी से हमने अपने आप मे बाहरी निखार लाया हैं, भीतर से बहुत दूर और अनजाने हो चुके है, हम लौट जाये अपने आप मे , तो अधिक महत्व बढ सकता है हमारी चेतना में , अपनी खुद की सहायता करना हमारा पहला कर्त्तव्य बनता है जब हम अपनी सहायता के काबिल बन जाये तो बहुत संभव है भीतर की क्षमताओ को पहचान कर जरूरत मंदो की सहायता के लिए सक्षम बन सके , बहुत जरूरी है अपनी सक्षमता औरो की सहायता निमित्त ।
हर पीर की दशा को स्पर्श करना होगा, अंगीकार करना होगा  , हर जगह झुकने की भावना के विस्तार की जरूरत है, तब हमें कोई बांध नही सकता सहयोग करने से । और यही से जीवन की मुक्ति के फूल खिलने लगते है ……।।।

छगन लाल गर्ग “विज्ञ”!

Comments

comments

No votes yet.
Please wait...
Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

About the Author:

Leave A Comment