कवियों का रहस्य वाद ।

कवियों का रहस्य वाद ।

By | 2017-12-05T21:55:53+00:00 December 5th, 2017|Categories: आलेख|Tags: , , |0 Comments

कवियों का रहस्य वाद

अनंत के प्रति जिज्ञासा भाव जब अपनी परिपक्व दशा मे फलीभूत होकर अवधारणाओं का तानाबाना मन-मस्तिष्क के साथ बांध लेता है, और उसी अनुरूप अपनी चेतना का अहसास गहरा होकर जीवन को प्रभावित करने लगता है, रहस्य वाद की भूमिका मे अवतरित होने लगता है । सामान्य अर्थ को जानने की शेष्टा में भी हमे असहज ,असामान्य भावभूमि की अनुभूति का अहसास जब होने लगे , वही से हम रहस्य वाद की दहलीज पर खडे होते है, चूंकि जिस मनोभूमि के साथ हम क्षण की सीमा मे बंधे हैं उसी क्षण सामान्य दशा से हम विलग हो जाते है, साधारणीकरण करने पर इसका यही अभिप्राय हुआ कि जो अवधारणा, या आध्यात्मिक चिंतन सामान्य पाठक या श्रौता के समझ से बाहर हो या समझ नही सके या दुश्कर हो अभिप्राय समझ पाना, उसी दशा, परिवेश या पल की सीमा के सत्य को रहस्य वाद कहा जा सकता है ।
अग्नि विधा , मधु विधा ,सामोपासना , प्राणोपासना आदि के द्वारा इस अइन्द्रिय अनुभूति को इन्द्रीय ग्राह्य बनाने की शेष्टा मानव जीवन में सबसे बड़ी उत्कंठा रहती है, ब्रह्म की निराकार अनुभूति को खंडित किये बिना साकार स्वरूप को ब्रह्म मे स्थापित करने की रूपकात्मक शेष्टा को हम रहस्य वाद कह सकते है ।
सामान्य रूप से हम कह सकते है कि रहस्य वाद का संबंध उस परम शक्ति से है जो विश्व निर्मात्री है, विश्व संचालिका है, वह परम शक्ति हमारी अनुभूति में बसती है, अदृश्य रहकर हमारे जीवन क्षेत्र को प्रभावित करती है, पर हमारी विवशता यह है कि हम उसे अभिव्यक्त नही कर सकते, हमारे शब्द उस दिव्य शक्ति को स्पर्श करने में समर्थ नही हो पाते । मौन  होकर केवल रसानुभूति में विहार कर सकते है, और वह भी केवल आत्मीय पृष्ठभूमि के स्तर पर …।
” एन साइक्लोपिडीया ” के अनुसार “परम तत्व के साथ सद्यः एकानुभूति का नाम रहस्यानुभूति है ।” यहां आत्मा की अद्वेत दशा की स्थिति में जब साधक आता है तब रहस्यानुभूति होने लगती है । इस तथ्य को आचार्य शुक्ल जी ने और अधिक स्पष्ट किया है “ज्ञान के क्षेत्र मे जिसे अद्वेत वाद कहते है भावना के क्षेत्र मे वही रहस्य वाद हैं।”
रहस्य वाद को समझने की कोशिश आध्यात्मिकता से जुडने की दशा पर निर्भर करती है, जीवात्मा की अन्तर्निहीत प्रवृत्तियो का रहस्यमय गुंफन ही रश्मियो का पुंज बनकर रहस्य वाद की भावना को फलीभूत करता है । जब साधक भावना की सीढ़ी पर सवार होकर आध्यात्मिक सता की अनुभूति को शब्द देने के प्रयास की और अग्रसर हुआ है वही साहित्य के क्षेत्र मे रहस्य वाद का प्रादुर्भाव हुआ है ।
साहित्यिक क्षेत्र मे रहस्य वाद की जडे बहुत गहरी हैं आदि काल से लेकर छाया वाद तक साहित्य की पहचान गूढ भारतीय दर्शन से प्रभावित रही है, दर्शन और साहित्य का समन्वय ही रहस्य वाद की पृष्ठभूमि है, अतः मुख्य रूप से नाथपंथ के प्रर्वतक गोरखनाथ से लेकर , बौद्धो और सिद्धों के दोहे, जैन रास ग्रंथ तक , तत्पश्चात भक्ति काल में निर्गुण भक्ति काव्य धारा के रहस्य वादी कवि कबीर, रैदास, नानक व सूफी काव्य धारा मे मलिक मोहम्मद जायसी, फरीद आदि का काव्य दर्शन की अनुपम कसौटी माना जा सकता है । भक्ति काल के उपरांत मुख्य रूप से रहस्य की घनीभूत मीमांसा का काल छाया वाद हैं जिसमे मुख्यतः महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रा नंदन पंत , निराला का काव्य रहस्यानुभूति की परमावस्था का द्योतक है । इनके काव्य में उस परम सता जो अदृश्य व अलौकिक है के प्रति निष्कर्षतः चार स्तरो पर रहस्यानुभूति देखने को मिलती है ,१~ प्रथम चरण मे उस अलौकिक सृष्टा के प्रति आकर्षण का भाव जो कवि की आत्मा मे प्रवेश कर विमोहित करता है -यथा
भर देते हो , बार बार प्रिय ।
करूणा की किरणो से ,
क्षुब्ध हृदय को पुलकित, कर देते हो ।
आते हो , मेरे अंतर में ….।। महादेवी वर्मा
२~द्वितीय चरण में – उस अलौकिक सता के प्रति प्रेम की गहराई का आभास यथा -” तुम मुझमे प्रिय, फिर परिचय क्या? ”
३~ विरहानुभूति – अलौकिक प्रियतम का बिछोह जीवन की दारूण दशा की अंतिम पराकाष्ठा है , यथा – ” मै नीर भरी दुख की बदरी ” या ” यह मंदिर का दीप, इसे नीरव जलने दो । ” – महादेवी वर्मा ।
४~मिलन का मधुर आनंद – आत्मा परमात्मा की अद्वेत दशा की अनुभूति ही संयोग काल हैं जिसमे परमानन्द की झलक आभासित हो रही है यथा – ” मुस्काता संकेत भरा नभ , अलि अब प्रिय आने वाले हैं ….।
रहस्य वाद जीवात्मा की अन्तर्निहीत प्रवृत्तियो का प्रकाशन हैं जिसमे परमानन्द की दिव्य अनुभूति को शान्त और निश्छल होकर कवि अभिव्यक्ति देना चाहता है, वह अनंत से इस कदर अपना संबंध जोड देना चाहता है कि कवि और कविता के बीच अंतर मिट जाता है ….और बच जाता है केवल रहस्य वाद …..।।।

छगन लाल गर्ग  “विज्ञ”!

 

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