पूजा

पूजा

By | 2017-12-09T19:52:15+00:00 December 9th, 2017|Categories: अन्य|Tags: , , |1 Comment

सांसों की माला में सुमिरु मै प्रिय का नाम
मैं आधुनिक नारी हूं ,ना मैं पतिव्रता सावित्री सी
ना हूं तैयार देने अग्निपरीक्षा वैदेही सदृशय ना ही मैं वीरांगना हूं लक्ष्मी सी तेजस्विनी

एक अदना सी स्त्री तुम्हारी सहधॆमिणी , जीवनसंगिनी
मैं तुम्हारे साया होने का दावा नहीं करती पर जीवन के हर पल ,हर क्षण तुम्हारा साथ चाहती हूं
तुम्हारा प्यार ,विश्वास मेरे जीवन का संबल है

मैं तुम्हारी पूजा नहीं करती तुम्हें मीरा जैसा भक्ति रस का प्याला समर्पित नहीं करती
ना ही राधा जैसे तुम्हारे रोम रोम में विद्यमान हूं
पर मैं भावों एहसासों का समर्पण करती हूं

तुम पर तुम्हारे माथे के तिलक का मान बनना चाहती हूं
दीपक जैसा दैदीप्यमान तो नहीं पर जुगनू से शुक्ष्म रोशनी चाहती हूं बनना
मेरे मन मंदिर में सजा पूजा का थाल जिसमें प्यार का चंदन ,समर्पण का अक्षत ,कर्तव्य दायित्व के पुषप, मेरी हया की हल्दी ,हमारे मिलन की धूपबत्ती महक रही है
मेरी सांसों की माला समर्पित है तुम्हारी अगुवाई में
सपतवदी पर वरे वचनों का मान रखना चाहती हूं
अपनी कोशिशों से आपके आंगन को महकाना
मेरी फुलवारी के फूल जो आप की अमूल्य देन हैं
उन्हें सजाना ,संवारना महकाना मेरा दायित्व है

मेरा दायरा ,सीमा मुझे ज्ञात है कभी उल्लंघन नहीं चाहती करना
पर सर्वदा समर्पण मेरी नियति नहीं
क्योंकि मैं नारी तो हूं पर अबला नारी की पक्षधर कदापि नहीं
मैं वो अमरबेल हूं जो आपके प्यार से तो फूलूंगी पर आप की अपेक्षा से मुरझाने लगूगी
क्या करूं मैं संवेदनाहीन हाड़-मांस का पुतला नहीं

कीर्ति अनुराग अग्रवाल

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  1. Chandramohan Kisku January 8, 2018 at 7:11 am

    सुन्दर रचना

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