भाव जगत

भाव जगत

By | 2017-12-09T19:50:35+00:00 December 9th, 2017|Categories: आलेख|Tags: , , |0 Comments

मानव की अनुभूति जो अन्तर्निहीत प्रवृत्तियो व स्वभाव से प्रस्फुटित होकर विचारो को प्रभावित व संचालित करती है , उस भीतरी दशा को भाव कहते है, यह हृदय जनित वह दशा  हैं जो हमे रस से जोड़कर आनंद की अनुभूति कराती है, भाव रस प्रदाता है, और इसकी पूरी प्रक्रिया है , जब हम किसी भी प्रकार के स्वाद की अनुभूति लेते है तो स्वाद वस्तु की अपेक्षा मन के अनुभूति करने की दशा पर निर्भर करता है, हमारी चेतना का जो वस्तु के साथ तादात्म्य हैं और उस तादात्म्य से भी ज्यादा रसानुभूति का भाव ही स्वाद प्रदान कराने में सक्षम है, सही अर्थो में स्थूल या सूक्ष्म के प्रति रागात्मकता और हमारी चेतना की संवेदनशीलता का अहसास ही भाव है।
भावों की पृष्ठभूमि हमारी मानव प्रदत प्रवृत्तियों पर निर्भर करती है और इसी आधार पर भाव दो भागों में विभाजित कर सकते है, यथा १- स्थायी भाव २ – संचारी भाव । स्थायी भाव मानव मन की उस दशा को स्पर्श करते है जहां मन की अनुभूति को किसी भी दशा मे दबाया न जा सके , दमित नही किया जा सके , इस प्रकार के भाव चिर काल तक रहकर हृदय को रसानुभूति देते रहते है ।
हमारे काव्य शास्त्रीयों के अनुसार स्थायी भाव नौ प्रकार के माने हैं ~
१- रति भाव – उत्पन्न रस , श्रृंगार रस , (संयोग, वियोग )
उद्धरण –
देखि रूप लोचन ललचाने , हरखे जनु निज निधि पहचाने ।
(रामचरितमानस)
२-शौक भाव -उत्पन्न रस, करूण रस , ( अनर्थ, नाश की व्याकुल दशा )
३-हास भाव -उत्पन्न रस , हास्य रस ( आंगिक , वैचारिक, वेशभूषा जनित , विश्रृंखलता से युक्त गतिविधि )
४-क्रोध भाव – रोद्र रस , ( काम , बिगाड़ने पर उत्तेजित वृति)
५- उत्साह भाव – वीर रस ( वीरता ,दान , दया की  वृत्ति )
६- भय भाव – भयानक रस ( सामर्थ्य अभाव में संघर्ष से भय वृत्ति )
७- जुगुप्सा भाव – वीभत्स रस ( गंदी वस्तु विचार  के प्रति घृणा वृत्ति )
८- विस्मय भाव – अदभुत रस , ( विचित्र, अलौकिक दृश्य से आश्चर्य की वृत्ति )
९- निर्वेद भाव – शान्त रस ( संसार के प्रति वैराग्य वृत्ति )
उपरोक्त भावों को परिपुष्ट और सहयोग करने निमित्त  मन के भीतर संचारी भाव पानी के बुलबुलों की  भाँति शीघ्र उत्पन्न भी होते है और विनष्ट भी हो जाते है उनकी विद्वानों ने संख्या ३३ मानी है , यथा -निर्वेद, आवेग,दीनता , श्रम ,मद ,जडता, उग्रता , मोह, विबोध , स्वप्न, ग्लानि, शंका, आलस्य, चिंता, आशा, स्मृति,  चपलता, हर्ष, गर्व ,विशाद, उत्सुकता,निन्द्रा , इर्ष्या, मति,व्याधि , अवहित्था , उन्माद, मरण ,त्रास , वितर्क अपमान, मान ,व्यथा आदि।
जिस कारण या दशा से स्थायी भाव प्रस्फुटित होकर प्रभावित करते है उस स्थिति को विभाव माना गया है, इसके तीन सोपान है , आलंबन, उद्दीपन और आश्रय ।
भावों के संबंध में परिचय देने वाली मानव कृत चेष्टा या स्वक्रियाओं को अनुभाव कहते है जो चार तरह से परिलक्षित होते है, १- कायिक अनुभाव यथा – आँख, भौह , हाथ आदि शारीरिक अंगो की चेष्टाऐ।
२-मस्तिष्क संबंधी चेष्टाऐ -चक्कर आना, संज्ञा हीन होना, अचेतन होना आदि।
३- आहार्य – वेशभूषा द्वारा भाव प्रदर्शन ।
४- शात्विक चेष्टाऐ – शारीरिक अंग विकार यथा – स्वेद , स्तंभन , रोमांस, स्वर भंग ,कंपन ,अश्रुपात आदि ।
उपरोक्त विवेचन के परिप्रेक्ष्य मे भाव जीवन का स्पंदन है, जीवंतता का परिचायक है और मानव चेतना व विकास का संचालन कर्ता है, भाव मानव मन के रस की दशा हैं और यह दशा यह प्रतिपादित करती है कि किसी भी वस्तु मे रस नही होता , वस्तु सिर्फ रस के निमित्त बनती है, वैज्ञानिक भी इस तथ्य के हिमायती है कि वस्तु मे कोई रंग नही होता , वस्तु केवल निमित्त होती है, किसी भी रंग को हमारे भीतर निर्माण करने के लिए । ठीक यही दशा वस्तु और रस निर्माण की है ,और इस अनुभूति की भीतरी दशा को ही भाव कहे तो शायद अतिशयोक्ति नही होगी ….।।।

छगन लाल गर्ग “विज्ञ”!

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