हमारा खून

हमारा खून

By | 2017-12-19T20:56:16+00:00 December 19th, 2017|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

वे जमीन लुट रहे है

घर से बेदखल कर रहे है
कह रहे है ——-
इसका नाम ही विकास

वे जंगल और पहाड़ों से
खदेड़ रहे है
वैसे बन्जार देशों में
जाहाँ खेती का ठिकान नहीं

जंगल से पेड़ काटने की
आवाज लगातार आ रही है
अरे वो विनाश के ठेकेदार
होशियार ______
पेड़ -लत्ताओं से
निकल रहा है
हमारा ताजा खून.

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