मेरी स्वप्न पर

मेरी स्वप्न पर

By | 2017-12-20T06:43:05+00:00 December 20th, 2017|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

मेरी फूटी छज्जा

पुआल की झोपडी में
खजूर पाटिया
फटा गद्धा पर
लेट कर तकते रहता था
आसमान की ओर
और सोरेन इपिल ,भुरका इपिल
बूढ़ी परकोम को देख -देखकर
डूब जाता था
स्वप्नों की नगर में
वन की फल ,फूल और मूल
खाकर भूल जाता था
पेट आग
और स्वप्नों में
मीठी -मीठी पकवान बनाता था
मेरे सामने घूमते रहता था
वह पकवानें
पर जब से
छीन लिया है हमसे
आधा कट्ठा जमीन
जंहा मैं
पुआल और घास -फूस से
झोपड़ी बनाया था
छीन लिया हमसे
पुरखों से मिली
वन -जंगल और नदी
जंहा से मुझे
खाना मिलता था

सुन रहा हूँ
वहाँ
सरकार नगर बसायेंगे
हिल स्टेशन
गरीबों को खदेड़कर
अमीरों के लिए रहने की जगह
बदल रही है वक्त
बदल रहा है समाज की नियम
अब मेरी स्वप्न पर भी
सरकार ने लगाया है
IPC 144
मेरी हक़ और अधिकार की
पथ पर
बनाई है ऊँची दिवार
और मेरी निर्धनता
उसके लिए बना है
छाती फुलाकर
जोर-जोर की हँसी।

—————————————————————————————————-
*सोरेन इपिल ,भुरका इपिल ,बूढी परकोम =संताल ज्योतिष के अनुसार तारों के समूह का नाम

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